India GDP: जहाँ एक ओर पूरी दुनिया ईरान युद्ध और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के कारण आर्थिक मंदी की आशंका से सहमी हुई है, वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी सकारात्मक खबर आई है। वैश्विक अनिश्चितताओं और मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की आर्थिक बुनियाद अडिग बनी हुई है। इसी भरोसे को पुख्ता करते हुए ‘फिच रेटिंग्स’ ने भारत की जीडीपी (GDP) ग्रोथ का अनुमान बढ़ा दिया है। फिच ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान 7.4% से बढ़ाकर 7.5% कर दिया है।
घरेलू मांग और उपभोक्ता खर्च: भारत की ग्रोथ के मुख्य इंजन
फिच रेटिंग्स के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा सहारा इसकी मजबूत घरेलू मांग से मिल रहा है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान उपभोक्ता खर्च में 8.6% की प्रभावशाली वृद्धि हो सकती है, जबकि निवेश के मोर्चे पर 6.9% की बढ़त की उम्मीद है। फिच का मानना है कि बाहरी झटकों के बावजूद भारत का आंतरिक बाजार इतना सक्षम है कि वह विकास की गति को बनाए रख सके। हालांकि, एजेंसी ने यह भी संकेत दिया है कि FY27 में विकास दर थोड़ी धीमी होकर 6.7% और FY28 में 6.5% तक रह सकती है।
ईरान युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों का वैश्विक गणित
फिच ने अपनी ‘ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक मार्च 2026’ रिपोर्ट में वैश्विक विकास दर 2.6% रहने का अनुमान जताया है। हालांकि, यह पूरी तरह से कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करता है। फरवरी के अंत में अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। फिच का बेसलाइन अनुमान है कि यदि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ एक महीने तक बंद रहता है, तो मार्च तक कीमतें 100 डॉलर को छू सकती हैं। हालांकि, वर्ष 2026 के अंत तक तेल की औसत कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल रहने की संभावना है।
आर्थिक संकेतक: जीएसटी कलेक्शन और डिजिटल पेमेंट में तेजी
भले ही जनवरी और फरवरी के कुछ आंकड़ों में आर्थिक गतिविधियों की गति थोड़ी सुस्त दिखी हो, लेकिन बुनियादी संकेतक (High-Frequency Indicators) अभी भी सकारात्मक हैं। फिच ने उल्लेख किया कि जीएसटी कलेक्शन, मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट, हवाई यात्रा में बढ़ोतरी और डिजिटल पेमेंट्स की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि भारत की अर्थव्यवस्था लचीली बनी हुई है। इसके अलावा, बैंकिंग क्षेत्र में क्रेडिट ग्रोथ अभी भी डबल डिजिट में बनी हुई है, जो औद्योगिक और व्यक्तिगत निवेश के लिए एक अच्छा संकेत है।
बेस ईयर में बदलाव और महंगाई की मध्यम चुनौती
जीडीपी गणना के लिए आधार वर्ष (Base Year) को 2011-12 से बदलकर 2022-23 करने के बाद आर्थिक विकास के आंकड़ों में अधिक स्पष्टता आई है। फिच के अनुसार, इससे ग्रोथ का ट्रेंड अब अधिक संतुलित दिख रहा है। महंगाई के मोर्चे पर, जनवरी में हेडलाइन इंफ्लेशन 2.7% रहा। एजेंसी का अनुमान है कि दिसंबर 2026 तक महंगाई बढ़कर 4.5% तक पहुंच सकती है। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो यह आंकड़ा और ऊपर जा सकता है, जिससे लोगों की वास्तविक आय पर दबाव बढ़ेगा।
आरबीआई की मौद्रिक नीति और ब्याज दरों का भविष्य
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी मौद्रिक नीति में फिलहाल सतर्कता का रुख अपनाया हुआ है। फिच का कहना है कि आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने फरवरी में ब्याज दर को 5.25% पर स्थिर रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल और अगले वित्त वर्ष में भी ब्याज दरों में किसी बड़े बदलाव या भारी कटौती की संभावना कम है। सरकार का फोकस सार्वजनिक पूंजीगत व्यय (Public Capex) को बढ़ाने पर रहेगा, जिससे बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को गति मिलेगी और निजी निवेश के लिए भी रास्ते खुलेंगे।
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