Dr. Mohan Bhagwat: “संघ को न सत्ता चाहिए, न…”RSS प्रमुख ने कह दी ये बड़ी बात

RSS प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ को सत्ता, लोकप्रियता या प्रसिद्धि की कोई लालसा नहीं है। उनका मानना है कि संगठन का एकमात्र उद्देश्य देश सेवा और समाज में सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक सामंजस्य बनाए रखना है। इस बयान ने संघ के दृष्टिकोण पर नया प्रकाश डाला।

Wrriten By :

Neha Mishra

Published On :

फ़रवरी 26, 2026

Dr. Mohan Bhagwat: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हाल ही में अपने पंजाब प्रवास के दौरान संघ की कार्यप्रणाली, इसके उद्देश्यों और राष्ट्र निर्माण में नागरिक योगदान पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला। पठानकोट में आयोजित ‘सेवा मुक्त सेना अधिकारी गोष्ठी’ को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ को केवल बाहरी दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता।

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भीतर से समझने की आवश्यकता

डॉ. भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि संघ की वास्तविकता को जानने के लिए व्यक्ति को उसे भीतर से देखना और अनुभव करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि अक्सर संघ के बारे में बाहरी धारणाएं भ्रामक हो सकती हैं, जबकि इसका वास्तविक स्वरूप निस्वार्थ सेवा है।

निस्वार्थ भाव और सत्ता से दूरी

अपने संबोधन में उन्होंने संघ के मूल दर्शन को स्पष्ट करते हुए कहा कि संगठन का लक्ष्य न तो राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना है, न ही इसे लोकप्रियता या किसी प्रकार के विशेष अधिकारों की लालसा है। संघ किसी भी तरह की प्रसिद्धि की आकांक्षा किए बिना निरंतर देशहित के लिए कार्य करने में विश्वास रखता है। इसका एकमात्र ध्येय राष्ट्र की उन्नति और समाज का कल्याण है।

सेना: विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण

सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों से संवाद करते हुए डॉ. भागवत ने भारतीय सेना की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि हमारी सेना ‘विविधता में एकता’ का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण पेश करती है। जिस प्रकार सेना के जवान अलग-अलग पृष्ठभूमि से आकर एक लक्ष्य के लिए समर्पित रहते हैं, उसी भावना को भारतीय समाज के भीतर भी मजबूत करने की आवश्यकता है।

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समग्र राष्ट्र सुरक्षा का दृष्टिकोण

डॉ. भागवत के अनुसार, देश की रक्षा केवल सीमाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एक सशक्त राष्ट्र के लिए निम्नलिखित चार स्तंभ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

  • सामाजिक सामंजस्य: समाज के सभी वर्गों के बीच भाईचारा और सद्भाव।
  • आर्थिक शक्ति: राष्ट्र का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और मजबूत होना।
  • सांस्कृतिक आत्मविश्वास: अपनी जड़ों और परंपराओं पर गर्व करना।
  • नागरिक कर्तव्य: प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन।

सामाजिक मूल्यों और स्वदेशी पर बल

उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, पारिवारिक मूल्यों को सहेजने और ‘स्वदेशी’ को अपनाने पर विशेष चर्चा की। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति या संस्थान देशहित के कार्यों में लगे हैं, उन्हें समाज के हर वर्ग का भरपूर सहयोग मिलना चाहिए।

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