NATO Crisis : रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे भीषण युद्ध और यूरोप में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। ट्रंप प्रशासन ने जर्मनी में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या में भारी कटौती करने के स्पष्ट संकेत दिए हैं। फ्लोरिडा में मीडिया से बातचीत के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ़ किया कि वे केवल 5 हजार सैनिकों की वापसी तक ही सीमित नहीं रहने वाले हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि जर्मनी से वापस बुलाए जाने वाले सैनिकों की संख्या इस प्रारंभिक आंकड़े से कहीं अधिक होगी। ट्रंप के इस बयान ने न केवल जर्मनी बल्कि पूरे यूरोपीय रक्षा तंत्र में हलचल पैदा कर दी है।
पेंटागन की योजना और ट्रंप का सख्त रुख
शुरुआती जानकारी के अनुसार, पेंटागन ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की थी कि लगभग 5 हजार अमेरिकी फौजियों को जर्मनी से हटाकर वापस स्वदेश बुलाया जाएगा। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप का ताजा बयान इस संख्या को कहीं आगे ले जाता दिख रहा है। ट्रंप ने इस निर्णय के पीछे के रणनीतिक कारणों का पूरी तरह खुलासा तो नहीं किया है, लेकिन उनके तेवरों से यह स्पष्ट है कि वे अमेरिका के सैन्य खर्च और विदेशों में सेना की तैनाती के पुराने ढर्रे में बड़ा बदलाव लाना चाहते हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि जर्मनी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी में ‘बहुत ज्यादा’ कटौती की जाएगी।
जर्मनी की प्रतिक्रिया: सुरक्षा के लिए अब आत्मनिर्भर बनेगा यूरोप
अमेरिकी राष्ट्रपति के इस अप्रत्याशित रुख पर जर्मनी के रक्षामंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका का यह कदम पूरी तरह से अनपेक्षित नहीं था, क्योंकि ट्रंप पहले भी कई मौकों पर यूरोपीय देशों के रक्षा बजट पर सवाल उठाते रहे हैं। पिस्टोरियस ने स्वीकार किया कि अब समय आ गया है जब यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा और रक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी। हालांकि, उन्होंने यह भी याद दिलाया कि यूरोप की धरती पर अमेरिकी सैनिकों की तैनाती केवल यूरोप के लिए नहीं, बल्कि स्वयं अमेरिका के रणनीतिक हितों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सैनिकों की वर्तमान संख्या और वापसी की प्रक्रिया
आंकड़ों पर गौर करें तो वर्तमान में जर्मनी में लगभग 36 हजार अमेरिकी फौजी तैनात हैं। यदि 5 हजार सैनिकों की वापसी होती है, तो यह कुल संख्या का लगभग सातवां हिस्सा होगा, लेकिन ट्रंप के संकेत बताते हैं कि यह कटौती इससे काफी बड़ी हो सकती है। सैन्य विशेषज्ञों का अनुमान है कि सैनिकों की वापसी की यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों के भीतर पूरी की जा सकती है। यह कदम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका ने यूरोप में सुरक्षा मजबूत करने के लिए अपनी उपस्थिति बढ़ाई थी, जिसे अब ट्रंप पीछे खींच रहे हैं।
नाटो और क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर पड़ने वाला प्रभाव
जर्मनी से अमेरिकी फौज की बड़ी वापसी का निर्णय नाटो (NATO) गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। जर्मनी लंबे समय से यूरोप में अमेरिकी सैन्य शक्ति का केंद्र रहा है। यहाँ से न केवल यूरोप बल्कि मिडिल ईस्ट और अफ्रीका में होने वाले ऑपरेशन्स को भी नियंत्रित किया जाता है। सैनिकों की संख्या घटने से रूस के खिलाफ बने सुरक्षा घेरे पर असर पड़ सकता है। आलोचकों का मानना है कि ऐसे समय में जब पुतिन की सेना आक्रामक है, अमेरिका का पीछे हटना क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बिगाड़ सकता है और छोटे यूरोपीय देशों में असुरक्षा की भावना बढ़ा सकता है।
सुरक्षा नीति में बड़े बदलाव का संकेत
डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा माना जा रहा है। ट्रंप का मानना है कि यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका के खजाने और उसकी सेना पर निर्भर रहने के बजाय खुद अधिक निवेश करना चाहिए। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जर्मनी और अन्य नाटो सहयोगी देश इस सैन्य रिक्तता को कैसे भरते हैं। क्या यूरोप एक नई एकीकृत सेना की ओर बढ़ेगा या फिर अमेरिका के साथ बातचीत कर इस कटौती को सीमित करने का प्रयास करेगा, यह भविष्य के गर्भ में है।
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