Dhar Bhojshala Dispute: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर का विवाद अब देश की शीर्ष अदालत की चौखट पर है। मंगलवार (14 जुलाई) को सुप्रीम कोर्ट में इस संवेदनशील मामले पर अहम सुनवाई हुई। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में नोटिस जारी करने की बात कही और जल्द ही एक विस्तृत सुनवाई तय करने का आश्वासन दिया।
भोजशाला कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि और सुप्रीम कोर्ट का रुख
चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष जब यह मामला आया, तो अदालत ने सबसे पहले सभी पक्षों से संयम और शांति बनाए रखने की पुरजोर अपील की। चीफ जस्टिस ने आगाह करते हुए कहा कि अदालत के भीतर होने वाली बहसों और टिप्पणियों का बाहर गलत अर्थ या संदर्भ निकाला जा सकता है, जिससे बचना बेहद जरूरी है। चूंकि यह मामला पहली बार शीर्ष अदालत के सामने आया है, इसलिए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी पक्षों की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए बहुत जल्द एक निश्चित तारीख पर इस पर व्यापक और विस्तृत सुनवाई की जाएगी।
मुस्लिम पक्ष की याचिका और हाई कोर्ट के आदेश पर आपत्ति
सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता हुजैफा अहमदी ने अपनी दलीलें पेश की। उन्होंने भोजशाला परिसर की पूर्व स्थिति में आए बदलावों को रेखांकित किया। अहमदी ने अदालत से कहा कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने वहां की दशकों पुरानी यथास्थिति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। उन्होंने पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि इस नए आदेश के कारण मुस्लिम समुदाय को वहां की धार्मिक गतिविधियों से पूरी तरह बाहर धकेल दिया गया है, और उन्हें इस बदलाव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में तुरंत अपील करने का पर्याप्त अवसर भी नहीं मिल सका।
धार्मिक सौहार्द और नमाज-पूजा की ऐतिहासिक परंपरा पर सिंघवी के तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इस मामले में ऐतिहासिक संदर्भों और सामाजिक समरसता का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी ऐतिहासिक स्थल को लेकर अलग-अलग दावे हो सकते हैं, जैसे कुतुब मीनार और ताजमहल को लेकर भी समय-समय पर दावे किए जाते रहे हैं। सिंघवी ने दलील दी कि धार की भोजशाला में पिछले लगभग 700 वर्षों से नमाज अदा की जा रही है, जिसका प्रमाण अंग्रेजों के जमाने के ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी मिलता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि नमाज के साथ-साथ बसंत पंचमी और प्रत्येक मंगलवार को हिंदू पक्ष द्वारा पूजा अर्चना किया जाना धार्मिक सौहार्द की एक अनूठी मिसाल थी। इस स्थापित और सुंदर व्यवस्था को अचानक बदला जाना न्यायसंगत नहीं है।
परिसर में शांति व्यवस्था पर सॉलिसिटर जनरल का वक्तव्य
मुस्लिम पक्ष की ओर से एक अन्य वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कोर्ट को याद दिलाया कि साल 1995 में दोनों पक्षों के बीच एक लिखित सहमति बनी थी, जिसके तहत दोनों समुदाय सौहार्दपूर्ण तरीके से अपनी-अपनी धार्मिक गतिविधियां संचालित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि 800 साल पुरानी मस्जिद में अचानक नमाज रुकवाना एक बेहद सख्त और अनुचित कदम है। दूसरी तरफ, सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को आश्वस्त किया कि हाई कोर्ट के आदेश को आए दो महीने बीत चुके हैं। इस अवधि में स्थानीय प्रशासन ने कानून-व्यवस्था और कोर्ट के निर्देशों के तहत सभी जरूरी कदम उठाए हैं और क्षेत्र में पूरी तरह से शांति और सुरक्षा का माहौल बना हुआ है।










