Delimitation Bill 2026: परिसीमन बिल 2026 पर लोकसभा में हंगामा, आगा रुहुल्लाह के बयान से भड़के अमित शाह

लोकसभा में परिसीमन बिल 2026 पर चर्चा के दौरान सांसद आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया।

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

अप्रैल 17, 2026

Delimitation Bill 2026: लोकसभा में परिसीमन बिल 2026 (Delimitation Bill 2026) पर चर्चा के दौरान उस समय स्थिति तनावपूर्ण हो गई, जब जम्मू-कश्मीर के सांसद आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी ने केंद्र सरकार की नीतियों पर कड़ा प्रहार किया। उनके एक बयान—’मैं चाहता हूं बंगाल भी कश्मीर बने’—पर गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ी आपत्ति जताई और अपनी सीट से खड़े होकर पलटवार किया। सदन में संघीय ढांचे और छोटे राज्यों की आवाज को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ गई।

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शक्ति संतुलन बिगड़ने का डर

आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी ने तर्क दिया कि नया परिसीमन देश के राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगा। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों के पास भविष्य में 400 से अधिक सीटें हो सकती हैं।

मेहदी के अनुसार, यदि ऐसा होता है, तो मुट्ठी भर बड़े राज्य मिलकर पूरे देश की किस्मत का फैसला करने लगेंगे। इससे जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत जैसे छोटे राज्यों की राजनीतिक ताकत नगण्य हो जाएगी और उनकी आवाज संसद में दब कर रह जाएगी।

‘बंगाल भी कश्मीर बने’

सांसद मेहदी ने 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने का जिक्र करते हुए खुद को ‘लाचार’ बताया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “मैं चाहता हूं कि दक्षिण भारत कश्मीर बने, बंगाल कश्मीर बने और उत्तर-पूर्व भी कश्मीर बने।” उनके इस बयान का उद्देश्य यह जताना था कि जिस तरह कश्मीर के अधिकारों के साथ कथित तौर पर ‘ज्यादती’ की गई, वैसी ही स्थिति परिसीमन के बाद अन्य राज्यों के साथ भी हो सकती है। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने तुरंत हस्तक्षेप किया और बेहद सख्त लहजे में पूछा— “आप यह क्या बोल रहे हैं?” शाह ने मेहदी के शब्दों को सदन की गरिमा और देश की एकता के खिलाफ बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई।

जेरीमेंडरिंग और अल्पसंख्यकों की आवाज पर खतरा

मेहदी ने आरोप लगाया कि परिसीमन के बहाने ‘जेरीमेंडरिंग’ (चुनावी सीमाओं में हेरफेर) की जा सकती है। उन्होंने दावा किया कि जम्मू-कश्मीर में पहले भी आबादी के अनुपात को इस तरह प्रभावित किया गया कि एक विशेष समुदाय का राजनीतिक प्रभाव कम हो जाए। उन्हें डर है कि इस प्रक्रिया से अल्पसंख्यकों की राजनीतिक ताकत घट जाएगी और उनके वोट की अहमियत खत्म हो जाएगी।

संघीय ढांचे और 1947 के वादों का जिक्र

अपने संबोधन के अंत में मेहदी ने इतिहास का स्मरण कराते हुए कहा कि 1947 में विलय के समय जम्मू-कश्मीर को कुछ सुरक्षा और अधिकारों की गारंटी दी गई थी, जिन्हें धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि संसद में सीटों का झुकाव केवल उत्तर भारत की ओर रहा, तो दक्षिण भारत और बंगाल जैसे राज्य खुद को अलग-थलग महसूस करेंगे।

यह पूरी बहस दर्शाती है कि परिसीमन बिल 2026 केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत के भविष्य के राजनीतिक मानचित्र और राज्यों के आपसी संबंधों की एक बड़ी चुनौती बन गया है।

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