Delhi High Court News: संसद लाठीचार्ज और सोनम वांगचुक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का पुलिस को नोटिस

संसद मार्च के दौरान छात्रों पर हुए लाठीचार्ज और सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में जवाब मांगा है। साथ ही घटनास्थल के सीसीटीवी और बॉडी कैमरा फुटेज को सुरक्षित रखने का आदेश दिया है।

Delhi High Court News

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

जुलाई 22, 2026

Delhi High Court News: राजधानी दिल्ली में हाल ही में हुए छात्र आंदोलन और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के खिलाफ हुई पुलिसिया कार्रवाई का मामला अब अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुए लाठीचार्ज और 18 जुलाई को जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक को जबरन हटाए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर दी है। चीफ जस्टिस देवेन्द्र उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने इस पूरे घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से लिया है। अदालत ने कानून-व्यवस्था और मानवाधिकारों से जुड़े इस संवेदनशील मामले में दिल्ली पुलिस को कड़ा रुख अपनाते हुए कई अहम निर्देश जारी किए हैं।

न्यायपालिका का दिल्ली पुलिस को कारण बताओ नोटिस

उच्च न्यायालय की पीठ ने याचिकाओं पर प्रारंभिक विचार करने के बाद दिल्ली पुलिस को एक आधिकारिक कारण बताओ नोटिस जारी किया है। अदालत ने पुलिस प्रशासन को इस पूरे घटनाक्रम और बल प्रयोग के औचित्य पर चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का समय दिया है। इसके बाद, याचिकाकर्ताओं को पुलिस के हलफनामे पर अपना प्रत्युत्तर (रिज्वाइंडर) प्रस्तुत करने के लिए अगले चार हफ्ते का समय मिलेगा। कार्यवाहियों को आगे बढ़ाते हुए खंडपीठ ने इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई के लिए 11 सितंबर की तारीख मुकर्रर की है। इसके साथ ही, अदालत ने साक्ष्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस को घटनास्थल के सभी सीसीटीवी (CCTV) और सुरक्षाकर्मियों के बॉडी कैमरा फुटेज को तत्काल प्रभाव से सुरक्षित रखने का कड़ा आदेश दिया है।

औपनिवेशिक दौर से भी बदतर बर्बरता का आरोप

अदालत कक्ष में याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर हुए घटनाक्रम का पूरा ब्योरा पीठ के सामने रखा। उन्होंने दलील दी, “छात्रों का यह आंदोलन पूरी तरह से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक था। पुलिस ने बिना किसी पूर्व चेतावनी या घोषणा के अचानक बर्बर लाठीचार्ज शुरू कर दिया। ऐसा दमनकारी रवैया तो औपनिवेशिक काल (Colonial Rule) में भी देखने को नहीं मिलता था।” हरिहरन ने संवैधानिक अधिकारों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य की किसी भी दमनकारी कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मनमानेपन की कसौटी पर परखा जाना अनिवार्य है। उन्होंने कोर्ट को अवगत कराया कि इस कार्रवाई में अत्यधिक क्रूरता का प्रदर्शन किया गया और प्रदर्शन में शामिल कई छात्राओं के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा बदसलूकी व छेड़छाड़ की गई, जिसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।

बीस दिनों तक शांतिपूर्ण रहा प्रदर्शन

मामले की पैरवी कर रहे एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत को बताया कि आंदोलनकारी पिछले लगभग 20 दिनों से शांतिपूर्ण ढंग से जंतर-मंतर पर एकत्रित थे और उन्होंने पहले ही घोषणा कर दी थी कि 20 तारीख को वे संसद की ओर शांतिपूर्ण मार्च करेंगे। विकास सिंह ने कहा, “प्रशासन को इस मार्च की पहले से पूरी जानकारी थी। 20 तारीख तक प्रदर्शन स्थल पर रत्ती भर भी हिंसा नहीं हुई थी, लेकिन इसके बावजूद सोची-समझी रणनीति के तहत शांतिपूर्ण सभा पर हिंसक हमला किया गया।” उन्होंने भावुक लहजे में कहा कि इस आंदोलन में हर वर्ग के संभ्रांत परिवारों के बच्चे, डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ शामिल थे। यहाँ तक कि वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े का बेटा भी वहां मौजूद था। उन्होंने वीडियो साक्ष्यों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि सादे कपड़ों (सिविल ड्रेस) में कुछ अज्ञात लोग लाठियां लेकर पुलिस के साथ मिलकर छात्रों को पीट रहे थे।

दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज करने की मांग

सुनवाई के अंतिम चरण में वकीलों ने कोर्ट से दोषियों को नामजद करने की पुरजोर मांग की। अधिवक्ता हरिहरन ने पीठ को बताया कि पुलिस और सादे कपड़ों में आए हमलावरों के हाथों में जो लाठियां थीं, उनमें नुकीली कीलें लगी हुई थीं, जिनसे मासूम बच्चों को बेरहमी से पीटा गया है। उन्होंने कहा, “इस हिंसक झड़प में अब तक 90 से अधिक छात्र गंभीर रूप से जख्मी हो चुके हैं और अस्पतालों में घायलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।” याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि वीडियो में साफ दिखाई दे रहे पहचान योग्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की जानी चाहिए। साथ ही, उन्होंने अदालत से कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए ऐसी संवेदनशील परिस्थितियों में बल प्रयोग, आंसू गैस और लाठीचार्ज को लेकर एक सख्त आचार संहिता (Code of Conduct) निर्धारित करने और पूरे मामले की निष्पक्ष उच्च स्तरीय न्यायिक जांच कराने की गुहार लगाई है।