Delhi High Court News: केजरीवाल-सिसोदिया को चुनाव लड़ने से रोकने की मांग खारिज, हाई कोर्ट ने जनहित याचिका को दुत्कारा

दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) का रजिस्ट्रेशन रद्द करने और अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया तथा दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक बयानों के लिए अवमानना की कार्रवाई हो सकती है, लेकिन पार्टी का पंजीकरण रद्द करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।

Delhi High Court News

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

मई 20, 2026

Delhi High Court News: दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) के शीर्ष नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से अयोग्य (Disqualify) घोषित करने तथा पार्टी का पंजीकरण रद्द करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेन्द्र उपाध्याय की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई करने के बाद याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि याचिका में लगाए गए आरोपों में कोई भी ठोस कानूनी आधार या दम नहीं है, इसलिए इस पर कोई भी दंडात्मक या सुधारात्मक आदेश जारी करने का कोई औचित्य नहीं बनता है।

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कोर्ट का तीखा सवाल

सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और अन्य ‘आप’ नेता अदालत की कार्यवाही को बदनाम करने और उसे लगातार विवादित बनाने का प्रयास कर रहे हैं, तो अदालत ने कानून की मर्यादा को लेकर कड़े सवाल पूछे। चीफ जस्टिस की बेंच ने पूछा, “क्या आप वाकई यह चाहते हैं कि हम भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का निर्देश जारी करें? लेकिन क्या मौजूदा कानून में किसी राजनीतिक पार्टी को डि-रजिस्टर या अमान्य करने का कोई स्पष्ट प्रावधान मौजूद है? यदि हां, तो उसका पूरा वैधानिक और कानूनी ढांचा अदालत के सामने पेश करें।”

सुप्रीम कोर्ट के अपवादों की समीक्षा

अदालत के सवाल पर याचिकाकर्ता के वकील ने स्वीकार किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) में किसी भी राजनीतिक दल का पंजीकरण सीधे तौर पर रद्द करने का कोई सीधा और स्पष्ट प्रावधान नहीं है। हालांकि, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया जिसमें तीन असाधारण और विशेष परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है, जिसके तहत किसी पार्टी का रजिस्ट्रेशन छीना जा सकता है। इस पर हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि वर्तमान मामला शुरुआती दो शर्तों में कहीं भी फिट नहीं बैठता। वहीं, तीसरी स्थिति यह है कि किसी पार्टी को तभी डि-रजिस्टर किया जा सकता है जब उसे यूएपीए (UAPA) या किसी अन्य देशविरोधी कानून के तहत एक गैरकानूनी संगठन घोषित कर दिया गया हो, जो कि यहाँ लागू नहीं होता।

शर्तों के उल्लंघन का तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29A(5) का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि रजिस्ट्रेशन के समय हर दल को लिखित रूप में यह वचन देना अनिवार्य होता है कि वह भारतीय संविधान और उसके मूल लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति पूरी निष्ठा रखेगा। वकील ने इसके समर्थन में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई दल इन शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। इस पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि केवल किसी पुराने फैसले का संदर्भ देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आपको यह वैधानिक रूप से साबित करना होगा कि अदालत के आदेश के बाद चुनाव आयोग के पास ऐसा कदम उठाने का असल कानूनी अधिकार है या नहीं।

चुनाव लड़ने से अयोग्य करने की मांग

याचिकाकर्ता ने अदालत में अपनी दूसरी बड़ी मांग दोहराते हुए कहा कि जो व्यक्ति भारतीय संविधान और न्यायिक प्रणाली पर भरोसा नहीं रखता, उसे संसद या राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने सीधे तौर पर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक का नाम लेते हुए कहा कि कोई भी नेता दल का सदस्य होकर न्यायिक प्रक्रिया को बदनाम नहीं कर सकता।

इस दलील को खारिज करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी राजनेता ने अदालत या न्यायपालिका के खिलाफ कोई आपत्तिजनक बयानबाजी की है, तो उसके लिए देश के कानून में ‘अदालत की अवमानना’ (Contempt of Court) जैसी अलग और स्थापित कानूनी प्रक्रियाएं पहले से मौजूद हैं। केवल राजनीतिक बयानों के आधार पर किसी चुनी हुई पार्टी के अस्तित्व को खत्म करना या जन प्रतिनिधियों को चुनाव लड़ने से रोकना कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता।

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