सदस्यता के लिए सभी देशों की सहमति जरूरी
पाकिस्तान की राह में सबसे बड़ी चुनौती BRICS के सदस्यता नियमों से जुड़ी है। नए सदस्य को शामिल करने के लिए मौजूदा सदस्यों के बीच सहमति जरूरी होती है। भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों में तनाव रहा है। यही वजह है कि भारत की सहमति पाकिस्तान की सदस्यता के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। चीन और रूस जैसे देशों से संभावित समर्थन मिलने के बावजूद भारत की भूमिका को नजरअंदाज करना इस्लामाबाद के लिए आसान नहीं है।

आर्थिक संकट भी सदस्यता की बड़ी वजह
पाकिस्तान की BRICS में दिलचस्पी सिर्फ रणनीतिक या कूटनीतिक महत्व तक सीमित नहीं है। देश लंबे समय से आर्थिक संकट, विदेशी मुद्रा की कमी और बढ़ते कर्ज जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश के नए अवसर तलाश रहा है। BRICS जैसे बड़े आर्थिक समूह से जुड़ने पर उसे वैश्विक बाजारों तक पहुंच बढ़ाने और आर्थिक सहयोग के नए रास्ते मिलने की उम्मीद है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक पर पाकिस्तान की नजर
BRICS से जुड़े न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी NDB को भी पाकिस्तान अपने लिए संभावित वित्तीय विकल्प के तौर पर देखता है। रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान ने बैंक में करीब 580 मिलियन डॉलर के निवेश से जुड़ा कदम उठाया है। इसका उद्देश्य पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता कम करना माना जाता है। पाकिस्तान लंबे समय से IMF और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से वित्तीय सहायता लेता रहा है। ऐसे में वैकल्पिक वित्तीय मंच उसके लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं।

BRICS का बढ़ता आर्थिक और वैश्विक प्रभाव
समय के साथ BRICS का प्रभाव तेजी से बढ़ा है और इसके विस्तार ने समूह को और महत्वपूर्ण बना दिया है। विस्तारित समूह में दुनिया की बड़ी आबादी का हिस्सा रहता है और क्रय शक्ति समानता के आधार पर वैश्विक GDP में इसकी हिस्सेदारी भी काफी बड़ी है। यही कारण है कि पाकिस्तान सहित कई देश BRICS से जुड़ने में रुचि दिखा रहे हैं। समूह का बढ़ता आर्थिक प्रभाव सदस्य देशों के लिए व्यापार, निवेश और बहुपक्षीय सहयोग के नए अवसर उपलब्ध करा सकता है।
भारत के लिए BRICS व्यापार का महत्वपूर्ण मंच
भारत के लिए भी BRICS सिर्फ कूटनीतिक मंच नहीं बल्कि आर्थिक और व्यापारिक सहयोग का महत्वपूर्ण माध्यम है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार BRICS देशों को भारत का निर्यात उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। भारत का कुल निर्यात करीब 64.3 अरब डॉलर से बढ़कर 95.7 अरब डॉलर तक पहुंचा है। इससे स्पष्ट होता है कि समूह भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए सदस्यता विस्तार से जुड़े फैसले भारत के आर्थिक और रणनीतिक हितों से भी जुड़े हैं।

चीन और रूस से समर्थन जुटाने की कोशिश
पाकिस्तान अपनी सदस्यता की दावेदारी मजबूत करने के लिए रूस और चीन जैसे प्रभावशाली BRICS सदस्यों से समर्थन हासिल करने की कोशिश करता रहा है। पाकिस्तान के राजनयिकों ने भी अलग-अलग मौकों पर सदस्य देशों से संपर्क करने की बात कही है। इस्लामाबाद का उद्देश्य BRICS के भीतर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना और सदस्यता के लिए जरूरी समर्थन जुटाना है। हालांकि, केवल कुछ प्रमुख देशों का समर्थन मिलना पर्याप्त नहीं माना जाता।
भारत की सहमति बनी सबसे बड़ी बाधा
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती भारत की संभावित आपत्ति है। दोनों देशों के बीच सीमा, आतंकवाद और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर लंबे समय से मतभेद हैं। BRICS में नए सदस्य को लेकर सर्वसम्मति की आवश्यकता होने के कारण भारत की सहमति महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए रूस और चीन का समर्थन मिलने की स्थिति में भी पाकिस्तान की सदस्यता आसान नहीं होगी। फिलहाल इस्लामाबाद की कोशिश जारी है, लेकिन BRICS में प्रवेश के लिए उसे व्यापक सहमति हासिल करनी होगी।
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