Anant Singh Statement on Liquor Ban: बिहार में शराबबंदी पर बड़ा फैसला जल्द? अनंत सिंह और प्रशांत किशोर के बयान ने मचाई खलबली

बिहार में नई सरकार के आते ही शराबबंदी कानून पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। विधायक अनंत सिंह ने इसे हटाने की मांग की है, जबकि प्रशांत किशोर ने आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए शराबबंदी खत्म होने का दावा किया है।

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

अप्रैल 15, 2026

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Anant Singh Statement on Liquor Ban: बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद सियासी पारा चढ़ा हुआ है। एक तरफ जहां सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली है, वहीं दूसरी ओर बाहुबली विधायक अनंत सिंह और जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर के बयानों ने शराबबंदी कानून की समीक्षा को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। राज्य के खाली खजाने और बढ़ती तस्करी के बीच यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या नीतीश कुमार की 10 साल पुरानी नीति अब बदलने वाली है?

विधायक अनंत सिंह की बेबाक मांग

बताते चले कि, मोकामा के कद्दावर विधायक अनंत सिंह ने विधान मंडल परिसर में मीडिया से रूबरू होते हुए बिहार में पूर्ण शराबबंदी को समाप्त करने की वकालत की है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि मद्यनिषेध नीति अब राज्य के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है। विधायक का तर्क है कि शराब न मिलने की वजह से युवा अब ‘सूखे नशे’ और अन्य घातक नशीले पदार्थों की गिरफ्त में जा रहे हैं, जो स्वास्थ्य के लिए कहीं अधिक खतरनाक है। उन्होंने घोषणा की कि वे जल्द ही मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात कर इस प्रतिबंध को हटाने या इसमें रियायत देने का लिखित अनुरोध करेंगे।

वित्तीय संकट और राजस्व का भारी नुकसान

आंकड़ों की मानें तो शराबबंदी के कारण बिहार सरकार को पिछले एक दशक में वित्तीय मोर्चे पर बड़ा झटका लगा है। मद्यनिषेध लागू होने से पहले राज्य को सालाना लगभग 5 हजार करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता था। विशेषज्ञों का अनुमान है कि पिछले 9 वर्षों में बिहार के सरकारी खजाने को करीब 40 हजार करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। वित्त विभाग के भीतर भी यह चर्चा आम है कि यदि यह राजस्व प्राप्त होता, तो राज्य की विकास योजनाओं और बुनियादी ढांचे को बड़ी गति मिल सकती थी।

आर्थिक तंगी और वेतन संकट के कारण हटेगी शराबबंदी

जन सुराज अभियान के प्रणेता प्रशांत किशोर ने सरकार पर हमला बोलते हुए दावा किया है कि अगले 3-4 महीनों में बिहार में शराब की बिक्री पुनः शुरू हो सकती है। पीके का आरोप है कि राज्य इस समय भीषण आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि “बिहार के पास कर्मचारियों को वेतन देने और ठेकेदारों का भुगतान करने के लिए पैसे नहीं हैं।” प्रशांत किशोर के अनुसार, राजस्व बढ़ाने की मजबूरी में नई सरकार को शराबबंदी कानून पर यू-टर्न लेना ही पड़ेगा, क्योंकि सत्ता के संघर्ष में खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है।

प्रशासनिक मुस्तैदी पर सवाल

शराबबंदी के बावजूद जमीन पर कानून का क्रियान्वयन हमेशा सवालों के घेरे में रहा है। राज्य में अवैध शराब की होम डिलीवरी और तस्करी का एक समानांतर नेटवर्क खड़ा हो गया है। सबसे दुखद पहलू जहरीली शराब से होने वाली मौतें हैं, जिन्होंने बार-बार सरकार की किरकिरी कराई है। विपक्षी नेताओं और खुद एनडीए के सहयोगियों का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध के बजाय व्यावहारिक आबकारी नीति की आवश्यकता है, जिससे तस्करी पर लगाम लगे और मासूमों की जान बचाई जा सके।

बदलेगी 10 साल पुरानी शराब नीति?

अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर टिकी हैं। हालांकि जदयू अभी भी इस कानून को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रही है, लेकिन भाजपा के भीतर एक बड़ा वर्ग शराबबंदी कानून में संशोधन का पक्षधर है। जीतन राम मांझी जैसे कद्दावर नेता पहले ही इस नीति की आलोचना कर चुके हैं। सम्राट चौधरी के सामने चुनौती यह है कि वे नीतीश कुमार की इस महत्वाकांक्षी योजना को जारी रखते हैं या राज्य की आर्थिक स्थिति और कानून-व्यवस्था को देखते हुए इसमें कोई बड़ा बदलाव करते हैं।

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