‘बांग्ला अस्मिता’ vs विरोधी: अंडा-मछली वाले बयान से ममता ने क्यों बढ़ाई सियासी गर्मी?

कोलकाता पश्चिम बंगाल में चुनाव में ममता बनर्जी ने बांग्ला कार्ड चलना शुरू कर दिया है। बीते विधानसभा चुनाव यानी 2021 में भी उन्होंने भाजपा के आक्रामक अभियान के जवाब में यही कार्ड चला था। वही टीएमसी और यहां तक कि राज्य की सबसे बड़ी नेता हैं। पीएम नरेंद्र मोदी, अमित शाह समेत भाजपा के तमाम दिग्गज नेता बंगाल चुनाव के प्रचार में उतरते रहे हैं, लेकिन बांग्ला कार्ड ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत है। वह अपनी सभी सभाओं में बांग्ला बोलती हैं और स्थानीय मुद्दे ही उठाती हैं। आम लोगों से उनका कनेक्ट जोरदार है और बांग्ला संस्कृति,

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Published On :

मार्च 31, 2026

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कोलकाता
पश्चिम बंगाल में चुनाव में ममता बनर्जी ने बांग्ला कार्ड चलना शुरू कर दिया है। बीते विधानसभा चुनाव यानी 2021 में भी उन्होंने भाजपा के आक्रामक अभियान के जवाब में यही कार्ड चला था। वही टीएमसी और यहां तक कि राज्य की सबसे बड़ी नेता हैं। पीएम नरेंद्र मोदी, अमित शाह समेत भाजपा के तमाम दिग्गज नेता बंगाल चुनाव के प्रचार में उतरते रहे हैं, लेकिन बांग्ला कार्ड ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत है। वह अपनी सभी सभाओं में बांग्ला बोलती हैं और स्थानीय मुद्दे ही उठाती हैं। आम लोगों से उनका कनेक्ट जोरदार है और बांग्ला संस्कृति, भाषा जैसे संवेदनशील मुद्दे उठाकर वह बढ़त बनाती रही हैं।

ऐसा ही वह इस बार करती दिखने लगी हैं। उन्होंने एक रैली में सवाल उठा दिया कि यदि भाजपा सत्ता में आई तो फिर आप लोग मछली और अंडा नहीं खा पाएंगे। भाजपा मांसाहार के खिलाफ है और वह आपके खानपान पर ही पाबंदियां लगाने लगेगी। उन्होंने पश्चिम उत्तर प्रदेश और एनसीआर के कुछ इलाकों में हुए वाकयों के नाम पर ऐसा बयान दिया है। बंगाल में मछली खाना परंपरा का हिस्सा है और मांसाहार को लेकर वहां ऐसी कोई मान्यता नहीं है, जैसी उत्तर भारत के यूपी, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा जैसे राज्यों में दिखती हैं। ऐसे में बंगाल में उन्होंने भाजपा का नाम लेते हुए पाबंदियों की बात की तो साफ है कि वह बांग्ला कार्ड चलने की शुरुआत कर चुकी हैं।

ममता बनर्जी ने कहा, 'भाजपा शासित राज्यों में मछली नहीं खाई जाती। भाजपा यदि सत्ता में आई तो आप मीट, अंडा और मछली नहीं खा सकेंगे। भाजपा एकतरफा है और वह किसी धर्म में यकीन नहीं करती। ये लोग दंगा भड़काते हैं। दंगों के जरिए ही ये सत्ता में आते हैं। ये लोगों को मरवाकर सत्ता में आते हैं।' भाजपा की ओर से इस मसले पर काउंटर भी किया गया है, लेकिन ममता बनर्जी के बयान के गहरे मायने हैं और आने वाली कुछ और रैलियों में वह इसकी चर्चा कर सकती हैं। दरअसल बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम पर अलग-अलग राज्यों में चलने वाले अभियानों को भी वह बांग्ला भाषियों के साथ उत्पीड़न को जोड़कर देखती रही हैं।

इसे उन्होंने अकसर बांग्ला सम्मान से जोड़ा है और चुनाव में इसे मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं। 2021 में भी वह बांग्ला प्राइड के नाम पर बढ़त लेती दिखी थीं। ऐसे में देखना होगा कि शुभेंदु अधिकारी, समिक भट्टाचार्य समेत कई बांग्ला भाषी नेताओं के चेहरे आगे कर लड़ने वाली भाजपा क्या काट निकालती है। भाजपा की टॉप लीडरशिप में शामिल नेताओं में पीएम मोदी, अमित शाह और नितिन नवीन जैसे नेता हैं। ये सभी गैर-बांग्ला भाषी हैं। ऐसे में ममता बनर्जी का उनकी ही शैली और भाषा में काउंटर करना मुश्किल हो जाता है।

बंगाल में क्यों फूड कल्चर बन सकता है राजनीतिक मुद्दा
बता दें कि भारत की विविधता खानपान में भी दिखती है। यदि सावन में मांसाहार करना उत्तर भारत में सही नहीं मानते तो पूर्वी भारत में ऐसी कोई परंपरा नहीं है। यहां तक कि मछली को तो बांग्ला संस्कृति में शुभ अवसरों पर परोसा ही जाता है। ऐसे में उत्तर भारतीय खानपान शैली उससे एकदम अलग है और दोनों को जोड़कर देखा नहीं जा सकता। भाजपा मोटे तौर पर उत्तर भारत में ज्यादा मजबूत रही है। ऐसे में उत्तर भारतीय राज्यों का हवाला देकर ममता बनर्जी आम बंगालियों में भगवा दल के प्रति एक दूरी बनाने का प्रयास कर रही हैं।

 

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