Bengal Voter List Dispute : पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के ‘स्पेशल इन्टेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर मचे घमासान के बीच देश की सर्वोच्च अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने चुनाव आयोग द्वारा अपीलेट ट्रिब्यूनल के सदस्यों को ट्रेनिंग दिए जाने पर आपत्ति जताई थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी नाराजगी व्यक्त की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बेवजह की बाधाएं डालना उचित नहीं है। कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार और उनकी पार्टी के तर्कों को सुनते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भरोसा जताया और प्रक्रिया को बाधित न करने की नसीहत दी।
अपीलेट ट्रिब्यूनल की ट्रेनिंग पर विवाद
मामले की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के वकील दामा सेशाद्री नायडू ने पीठ को सूचित किया कि अपीलेट ट्रिब्यूनल को काम करने के तौर-तरीकों से अवगत कराने के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है। इस पर टीएमसी की ओर से वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने सवाल उठाया कि एक अर्ध-न्यायिक निकाय (Quasi-judicial body) को ट्रेनिंग देने की भला क्या आवश्यकता है? उनकी इस दलील पर सीजेआई सूर्यकांत भड़क गए और उन्होंने पूछा कि यदि चुनाव आयोग उन्हें काम की प्रकृति नहीं समझाएगा, तो और कौन समझाएगा? कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल में हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश स्तर के लोग शामिल होंगे, ऐसे में यह सोचना कि वे ट्रेनिंग मात्र से प्रभावित हो जाएंगे, पूरी तरह निराधार है।
जजों को परेशान करने पर कोर्ट की नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक और गंभीर मुद्दा उठाया। कोर्ट को जानकारी मिली कि मतदाता सूची से बाहर किए गए लाखों लोगों के दावों की जांच कर रहे डिस्ट्रिक्ट और सेशन कोर्ट के जजों को राजनीतिक समूहों द्वारा ज्ञापन देकर परेशान किया जा रहा है। जस्टिस बागची और जस्टिस पंचौली की मौजूदगी वाली बेंच ने कहा कि यह जजों का मूल काम नहीं है, वे केवल एक विशेष जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ऐसे में उन्हें राजनीतिक दबाव में लाना या उनके काम में बाधा डालना कतई स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि न्यायिक अधिकारियों को निष्पक्ष रूप से अपना कार्य करने दिया जाना चाहिए।
मतदाता सूची और भविष्य का अधिकार
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि अदालत का मुख्य सरोकार यह है कि आगामी चुनाव किस मतदाता सूची के आधार पर संपन्न हों। यदि किसी पात्र व्यक्ति का नाम सूची में शामिल होने से रह जाता है और उसे बाद में अपीलेट ट्रिब्यूनल से राहत मिलती है, तो वह कम से कम भविष्य के चुनावों के लिए अपनी जगह सुरक्षित कर सकेगा। कोर्ट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी नागरिक का मताधिकार तकनीकी कारणों या प्रशासनिक त्रुटियों की भेंट न चढ़ जाए।
लाखों दावों का निपटारा और समय सीमा
याचिकाकर्ताओं ने चिंता जताई थी कि बंगाल में अप्रैल में चुनाव हैं और 6 अप्रैल नामांकन की आखिरी तारीख है, ऐसे में 50 लाख लोगों का भाग्य अधर में है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट का हवाला देते हुए सकारात्मक आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि काम युद्धस्तर पर चल रहा है और प्रतिदिन लगभग 1.75 लाख से 2 लाख दावों का निपटारा किया जा रहा है। अब तक करीब 47 लाख मामलों की जांच पूरी हो चुकी है और 7 अप्रैल तक पूरी प्रक्रिया संपन्न होने की उम्मीद है।
नए मतदाताओं और फॉर्म 6 का मुद्दा
टीएमसी की ओर से एक साथ हजारों की संख्या में ‘फॉर्म 6’ (नए पंजीकरण) जमा किए जाने का मुद्दा भी उठाया गया। हालांकि, अदालत ने इस पर विचार करने से इनकार कर दिया। बेंच ने स्पष्ट किया कि वर्तमान सुनवाई केवल ‘स्पेशल इन्टेंसिव रिवीजन’ (SIR) पर केंद्रित है। नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े विवादों के लिए याचिकाकर्ताओं को उचित फोरम या मंच पर अपनी शिकायत दर्ज करानी चाहिए। इस बीच, एक कांग्रेस उम्मीदवार ने भी अपना नाम सूची में न होने की शिकायत की, जिन्हें कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के सक्रिय होने तक धैर्य रखने को कहा।










