Assam Election 2026: असम में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही सियासी पारा अपने चरम पर पहुँच गया है। राज्य में सत्ता के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को एक बार फिर जबरदस्त झटका लगा है। होली के उल्लास के ठीक बाद, राज्य की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कांग्रेस के खेमे में बड़ी सेंधमारी की है। कांग्रेस के तीन प्रभावशाली लेकिन निलंबित विधायकों ने आधिकारिक तौर पर कमल का साथ पकड़ लिया है, जिससे राज्य की राजनीति में खलबली मच गई है।
गुवाहाटी में भव्य समारोह के बीच बीजेपी का कुनबा बढ़ा
गुरुवार को गुवाहाटी स्थित बीजेपी प्रदेश मुख्यालय में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जहाँ कांग्रेस के तीन निलंबित विधायकों—कमलाख्या डे पुरकायस्थ, बसंत दास और शशिकांत दास ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने केंद्रीय मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा की गरिमामय उपस्थिति में इन नेताओं का स्वागत किया। विधायकों के साथ-साथ कांग्रेस के पूर्व संयुक्त सचिव पार्शा बॉब कालिता और तृणमूल कांग्रेस के पूर्व महासचिव कंगकन नाथ ने भी बीजेपी का दामन थाम लिया। चुनाव आयोग द्वारा अप्रैल में मतदान की संभावनाओं के बीच यह दलबदल विपक्षी गठबंधन के लिए किसी तगड़े झटके से कम नहीं है।
मुख्यमंत्री सरमा के करीबी और जमीनी पकड़ वाले चेहरे
बीजेपी में शामिल हुए ये तीनों विधायक लंबे समय से मुख्यमंत्री हिमंत विस्वा सरमा की कार्यशैली के प्रशंसक रहे हैं। कमलाख्या डे पुरकायस्थ करीमगंज (उत्तर) सीट से विधायक हैं, जबकि शशिकांत दास राहा और बसंत दास मंगलदोई (अनुसूचित जाति) निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि शशिकांत दास ने तो लगभग चार साल पहले 2021 में ही बीजेपी की नीतियों का खुलकर समर्थन करना शुरू कर दिया था। इन नेताओं के पाला बदलने से न केवल कांग्रेस का वोट बैंक प्रभावित होगा, बल्कि बीजेपी को उन क्षेत्रों में मजबूती मिलेगी जहाँ विपक्ष कड़ी टक्कर देने का दावा कर रहा था।
भूपेन बोरा के बाद कांग्रेस की मुश्किलें और बढ़ीं
असम कांग्रेस के लिए पिछला कुछ समय बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। पिछले महीने 22 फरवरी को पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा का बीजेपी में जाना पार्टी के लिए सबसे बड़ा आघात था। दिल्ली स्थित आलाकमान ने बोरा को रोकने की काफी कोशिशें की थीं, लेकिन उनकी नाराजगी और भविष्य की रणनीतियों ने उन्हें बीजेपी की ओर मोड़ दिया। इसके तुरंत बाद तीन विधायकों का जाना यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर गहरा असंतोष व्याप्त है। इसके अलावा, विधायक अब्दुल राशिद मंडल और शेरमन अली अहमद का ‘रायजोर दल’ में शामिल होना भी कांग्रेस की सत्ता में वापसी की उम्मीदों को धुंधला कर रहा है।
विपक्षी गठबंधन और सीटों के समीकरण की चुनौती
कांग्रेस इस बार बीजेपी को कड़ी चुनौती देने के लिए ‘असम सोनमिलितो मोर्चा’ नामक गठबंधन का नेतृत्व कर रही है। इसमें असम जातीय परिषद (AJP) और वामपंथी दलों के साथ सीट-शेयरिंग का समझौता तो हो गया है, लेकिन रायजोर दल के साथ अभी भी पेंच फंसा हुआ है। 126 सदस्यीय विधानसभा में फिलहाल एनडीए (NDA) की स्थिति काफी मजबूत है, जहाँ बीजेपी के पास 64, एजीपी के पास 9 और यूपीपीएल के पास 7 विधायक हैं। वहीं विपक्षी खेमे में कांग्रेस के 26 और एआईयूडीएफ के 15 सदस्य रह गए हैं। ऐसे में बागियों का जाना विपक्ष के हौसले पस्त कर सकता है।
चुनाव से पहले असम में ध्रुवीकरण की नई सुगबुगाहट
विशेषज्ञों का मानना है कि अप्रैल 2026 में होने वाले चुनावों से पहले बीजेपी अपनी ‘क्लीन स्वीप’ की रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस के कद्दावर नेताओं को अपने पाले में लाकर बीजेपी यह संदेश देना चाहती है कि विपक्ष के पास अब न तो नेतृत्व बचा है और न ही विजन। आने वाले दिनों में कुछ और विपक्षी चेहरों के पाला बदलने की अटकलें तेज हैं, जिससे असम का चुनावी दंगल और भी दिलचस्प होने वाला है।
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