Assam Election 2026: कांग्रेस और झामुमो का गठबंधन टूटा, हेमंत सोरेन ने अकेले चुनाव लड़ने का किया एलान

असम के चुनावी रण में बड़ा उलटफेर हो गया है। सीट बंटवारे पर बात न बनने के कारण कांग्रेस और झामुमो का गठबंधन टूट गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अब 19 सीटों पर अकेले उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। क्या यह फैसला असम में विपक्षी एकता को खत्म कर देगा?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मार्च 23, 2026

Assam Election 2026: पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले असम में विधानसभा चुनाव 2026 की सरगर्मियां तेज होते ही विपक्षी खेमे में बड़ी दरार सामने आई है। झारखंड में सत्ता की साझीदार झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस के बीच गठबंधन की कोशिशें असम की धरती पर धराशायी हो गई हैं। कई दौर की बातचीत और बैठकों के बाद भी सीट बंटवारे पर पेंच नहीं सुलझ सका, जिसके परिणामस्वरूप मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का साहसी और चौंकाने वाला फैसला लिया है। यह राजनीतिक अलगाव न केवल असम के चुनावी नतीजों को प्रभावित करेगा, बल्कि इसका प्रभाव झारखंड की अंदरूनी राजनीति पर भी पड़ना तय है।

सीटों के गणित पर दिल्ली से रांची तक चली माथापच्ची

गठबंधन को लेकर पिछले कई हफ्तों से चर्चाओं का बाजार गर्म था। विपक्षी एकजुटता को मजबूत करने के लिए रांची से लेकर दिल्ली तक कई अहम मुलाकातें हुईं। असम कांग्रेस के प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह और वरिष्ठ नेता गौरव गोगोई ने खुद हेमंत सोरेन से संपर्क साधा था। सोरेन ने भी दिल्ली जाकर कांग्रेस आलाकमान के साथ गहन मंथन किया, लेकिन सीटों की संख्या और क्षेत्रों के चयन पर सहमति नहीं बन पाई। अंततः, झामुमो ने अपने स्वाभिमान और सांगठनिक विस्तार को प्राथमिकता देते हुए 19 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है और उन्हें पार्टी का चुनाव चिन्ह ‘तीर-कमान’ आवंटित कर दिया गया है।

चाय बागानों और आदिवासी वोटों पर झामुमो की विशेष रणनीति

झामुमो ने असम में अपनी ताकत झोंकने के लिए उन क्षेत्रों को चुना है, जहाँ आदिवासी समुदाय और चाय बागान श्रमिकों की आबादी अधिक है। पार्टी का मानना है कि इन समुदायों के साथ उनका वैचारिक और सांस्कृतिक जुड़ाव कांग्रेस से कहीं अधिक गहरा है। माजबत विधानसभा क्षेत्र से प्रीति रेखा बरला और सोनारी से बलदेव तेली जैसे स्थानीय प्रभाव वाले चेहरों को उतारकर सोरेन ने अपनी मंशा साफ कर दी है। हालांकि, विपक्षी एकता की एक हल्की तस्वीर पेश करते हुए पार्टी ने बिहाली की सीट वामदलों (CPIML) के समर्थन में छोड़ दी है, लेकिन कांग्रेस के साथ अब उनकी सीधी चुनावी जंग है।

झारखंड की राजनीति पर असम की टूट का संभावित प्रभाव

असम में आई इस कड़वाहट की गूँज बहुत जल्द झारखंड की राजधानी रांची में सुनाई दे सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम के बाद झारखंड में आगामी राज्यसभा चुनावों के समीकरण बदल सकते हैं। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव होने वाले हैं, जहाँ अब तक माना जा रहा था कि एक सीट कांग्रेस को दी जाएगी। लेकिन असम के घटनाक्रम के बाद अब झामुमो दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर सकती है। यदि ऐसा होता है, तो झारखंड की गठबंधन सरकार में शामिल दोनों दलों के बीच दरार और चौड़ी हो सकती है।

चुनावी शेड्यूल और वर्तमान राजनीतिक स्थिति

असम की 126 विधानसभा सीटों के लिए 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होना है। 2021 के चुनावों में भाजपा ने 60 सीटें जीतकर अपनी पकड़ मजबूत की थी और इस बार भी वह बढ़त में नजर आ रही है। ऐसे में विपक्षी वोटों का बंटवारा भाजपा के लिए ‘वॉकओवर’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। सवाल यह है कि क्या झामुमो अपने दम पर जीत दर्ज कर पाएगी या वह केवल कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाकर भाजपा की राह आसान करेगी।

4 मई को आएगा जनादेश: सोरेन के फैसले की होगी अग्निपरीक्षा

झामुमो और कांग्रेस के बीच की यह खींचतान असम के मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम को झामुमो के विस्तार के लिए एक नई जमीन के रूप में देखा है, लेकिन यह दांव कितना सफल होगा, इसका पता 4 मई को चुनावी नतीजे आने पर ही चलेगा। यदि झामुमो कुछ सीटें जीतने में सफल रहती है, तो यह पार्टी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि होगी, अन्यथा इसे विपक्षी एकजुटता को कमजोर करने वाले कदम के रूप में याद किया जाएगा।

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