AMCA Fighter Jet : भारत के AMCA को अमेरिकी इंजन की जरूरत क्यों? दुनिया के कई फाइटर जेट भी US टेक्नीक पर निर्भर

भारत का स्वदेशी AMCA फाइटर जेट देश की सबसे महत्वाकांक्षी रक्षा परियोजनाओं में शामिल है, लेकिन इसके लिए अमेरिकी इंजन की चर्चा तेज है। आखिर भारत को विदेशी इंजन की जरूरत क्यों है, कौन-सी तकनीकी चुनौतियां सामने हैं और दुनिया के कई आधुनिक लड़ाकू विमान अमेरिकी इंजन पर क्यों निर्भर हैं, जानिए पूरी रिपोर्ट।

AMCA Fighter Jet

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जून 29, 2026

AMCA Fighter Jet : भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिसका सबसे महत्वाकांक्षी प्रतीक पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ लड़ाकू विमान (AMCA) प्रोजेक्ट है। हालांकि, इस सपने के आड़े एक बड़ी तकनीकी और आर्थिक बाधा आ रही है—फाइटर जेट इंजन। भारत ने एयरफ्रेम, रडार और एवियोनिक्स में भले ही महारत हासिल कर ली हो, लेकिन इंजन के लिए अब भी विदेशी निर्भरता बनी हुई है। हाल ही में अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) द्वारा F414 इंजन की कीमत में की गई भारी वृद्धि ने न केवल AMCA, बल्कि तेजस Mk2 कार्यक्रम की समयसीमा और बजट पर भी गंभीर संकट के बादल खड़े कर दिए हैं।

कीमतों में तीन गुना उछाल से बढ़े संकट

AMCA प्रोजेक्ट के लिए GE के साथ चल रही वार्ता कीमत के मुद्दे पर पूरी तरह ठप पड़ गई है। DRDO के सूत्रों के अनुसार, शुरुआती दौर में F414 इंजन की अनुमानित लागत करीब 70-80 करोड़ रुपये प्रति यूनिट थी, जिसे अब कंपनी ने लगभग तीन गुना बढ़ा दिया है। चूंकि AMCA का डिजाइन पहले ही इसी इंजन के तकनीकी विनिर्देशों के अनुसार तैयार हो चुका है, इसलिए इस चरण में इसे बदलना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि प्रोजेक्ट के लिए घातक भी हो सकता है। सरकार ने प्रोटोटाइप के लिए 15,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, लेकिन इंजन की आसमान छूती कीमतों ने पूरे बजट को असंतुलित कर दिया है।

प्रोटोटाइप विकास और भविष्य की योजना

एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) को AMCA के पांच फ्लाइंग प्रोटोटाइप तैयार करने के लिए 15 F414 इंजनों की आवश्यकता है। योजना के मुताबिक, अगले सात वर्षों में 1800 टेस्ट सॉर्टीज पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि 2034-35 तक इसे भारतीय वायुसेना में शामिल किया जा सके। इसके लिए चुनी गई औद्योगिक टीमों को अनुबंध के 30 महीने के भीतर पहला प्रोटोटाइप पेश करना होगा। वहीं, तेजस Mk2 की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। Mk1A के लिए F404 इंजनों की आपूर्ति में हो रही पहले से ही देरी ने उत्पादन चक्र को प्रभावित किया है। विदेशी इंजन पर यह निर्भरता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक जोखिम भी है, क्योंकि यह भारत की उत्पादन और निर्यात प्राथमिकताओं को दूसरे देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति से बांध देती है।

वैश्विक स्तर पर इंजन तकनीक की जटिलता

फाइटर जेट इंजन का निर्माण दुनिया की सबसे कठिन एयरोस्पेस इंजीनियरिंग चुनौतियों में से एक है। इसमें सिंगल-क्रिस्टल टरबाइन ब्लेड और अत्यधिक तापमान सहने वाली उन्नत मिश्रधातुओं (एलोय) का उपयोग होता है। यही कारण है कि दुनिया के गिने-चुने देशों के पास ही इसे बनाने की क्षमता है। तुर्किये, दक्षिण कोरिया और स्वीडन जैसे देश भी अपने स्वदेशी लड़ाकू विमानों के लिए शुरुआती दौर में अमेरिकी इंजनों पर निर्भर हैं। भारत का ‘कावेरी इंजन’ प्रोजेक्ट भी लंबे समय से तकनीकी चुनौतियों से जूझ रहा है। हालांकि, अब इसका उपयोग मानव रहित लड़ाकू विमान (UCAV) ‘घातक’ में करने की योजना है। अंततः, भारतीय रक्षा आत्मनिर्भरता की असली परीक्षा तभी सफल होगी जब देश खुद का अत्याधुनिक फाइटर इंजन विकसित करने में सक्षम हो जाएगा।