Haldwani Violence Case: हल्द्वानी हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल, अब्दुल मलिक की जमानत बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने 2025 के हल्द्वानी हिंसा मामले के मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक की जमानत को बरकरार रखते हुए उत्तराखंड सरकार की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने तीखा सवाल उठाया कि भीड़ द्वारा पुलिस स्टेशन जलाने मात्र से UAPA कैसे लागू किया जा सकता है। इस फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिहाज से बड़ा माना जा रहा है।

Haldwani Violence Case

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

जुलाई 31, 2026

Haldwani Violence Case: सुप्रीम कोर्ट ने 2025 के चर्चित हल्द्वानी हिंसा मामले में मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक की जमानत को पूरी तरह से बरकरार रखा है। शुक्रवार को हुई अहम सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने यह बड़ा फैसला सुनाते हुए उत्तराखंड सरकार की तरफ से दाखिल की गई चुनौती याचिका को खारिज कर दिया। मामले पर कड़ी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यदि कोई भीड़ किसी पुलिस थाने में आग लगा देती है, तो मात्र इस आधार पर किसी पर यूएपीए (UAPA) जैसी गंभीर धाराएं कैसे लागू की जा सकती हैं।

अदालत की तीखी कानूनी टिप्पणियां

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) और यूएपीए (UAPA) दोनों बिल्कुल अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार से तीखे शब्दों में पूछा कि सिर्फ यह मानकर यूएपीए कैसे लगाया जा सकता है कि हिंसक भीड़ ने पुलिस स्टेशन को जला दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में कड़े आतंकवाद विरोधी कानूनों के इस तरह के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े किए और राज्य की दलीलों पर कड़ा रुख अपनाया।

सीजेआई सूर्यकांत की बेंच का फैसला

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने अब्दुल मलिक को जमानत देने के उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश में किसी भी प्रकार का दखल देने से साफ इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही हाईकोर्ट की कानूनी दलीलें शुरुआती स्तर पर अधूरी या संक्षिप्त रही हों, लेकिन जब मामला किसी नागरिक की व्यक्तिगत आज़ादी (Personal Liberty) से जुड़ा हो, तो उसमें हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं बनता है।

बनभूलपुरा हिंसा और उत्तराखंड हाईकोर्ट का 16 अप्रैल का जमानत आदेश

यह पूरा कानूनी विवाद उत्तराखंड हाईकोर्ट के 16 अप्रैल, 2026 के उस ऐतिहासिक आदेश से जुड़ा है जिसके तहत मलिक को जमानत दी गई थी। आरोपी मलिक पर हल्द्वानी के बनभूलपुरा में 8 फरवरी, 2024 को भड़की भीषण हिंसा के सिलसिले में भारतीय दंड संहिता (IPC), UAPA, आर्म्स एक्ट और अन्य कई कठोर दंडात्मक कानूनों के तहत गंभीर आरोप दर्ज किए गए थे। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से यह आधार बनाया था कि जांच दस्तावेजों से साफ जाहिर होता है कि घटना के वक्त मलिक मौके पर मौजूद नहीं था और उसके बेटे अब्दुल मोईद समेत अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी थी।

उत्तराखंड सरकार की दलीलें और सीनियर एडवोकेट गौरव भाटिया का पक्ष

दूसरी ओर, उत्तराखंड राज्य सरकार की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने सुप्रीम कोर्ट में पुरजोर दलील दी कि हाईकोर्ट ने बिना किसी ठोस कारण या विस्तृत विश्लेषण के आरोपी को जमानत दे दी है। उन्होंने तर्क दिया कि मलिक इस पूरी हिंसा का मुख्य साज़िशकर्ता था, इसलिए घटना स्थल पर उसकी शारीरिक मौजूदगी न होना कोई मायने नहीं रखता। राज्य सरकार की तरफ से यह भी तर्क रखा गया कि यूएपीए की धारा 43D(5) के तहत तय की गई कड़ी कानूनी शर्तों पर अदालत ने पर्याप्त विचार नहीं किया था, जिसे सर्वोच्च अदालत ने फिलहाल खारिज कर दिया।