Iran-US Conflict: यमन के हूती विद्रोही रविवार, 29 मार्च को इजरायल के खिलाफ अपना दूसरा सैन्य अभियान चला रहे हैं। इस कदम से पश्चिम एशिया में संघर्ष की आग और तेज़ हुई है। दक्षिणी कब्जे वाले फिलिस्तीन में कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर हूतियों ने क्रूज मिसाइल और ड्रोन हमले किए। हूतियों के सैन्य प्रवक्ता Yahya Sari ने टेलीग्राम पर जारी बयान में इसे “पवित्र जिहाद युद्ध” करार दिया। उन्होंने कहा कि यह अभियान ईरान और लेबनान में हिज़्बुल्लाह समेत सहयोगी समूहों की सैन्य गतिविधियों के साथ समन्वित था और सभी उद्देश्यों में सफलता प्राप्त हुई।
सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया

याह्या सरी के बयान के अनुसार, हूतियों ने अपने अभियान में दक्षिणी कब्जे वाले फिलिस्तीन में ज़ायोनी दुश्मन के कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। यह अभियान ईरान में उनके मुजाहिदीन साथियों और लेबनान में हिज़्बुल्लाह द्वारा चलाए जा रहे अभियानों के अनुरूप था। उन्होंने कहा, “अल्लाह के रहम-ओ-करम से इस अभियान ने अपने सभी लक्ष्य हासिल कर लिए हैं। हमारा यह अभियान पवित्र जिहाद युद्ध का हिस्सा है और इसे आगे भी जारी रखा जाएगा।”
अभियान का पहला चरण
हूतियों ने इजरायली सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन हमलों की बौछार की। उनके बयान के अनुसार यह अभियान ईरान और लेबनान में चल रहे प्रतिरोध प्रयासों के साथ समन्वयित था। हूतियों ने कसम खाई कि उनके अभियान का उद्देश्य पूरा होने तक और प्रतिरोध के सभी मोर्चों पर आक्रामकता खत्म न होने तक ये हमले जारी रहेंगे। इस हमले में प्रमुख इजरायली सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया और यह रणनीति पूरी तरह से पूर्व नियोजित एवं समन्वित बताई जा रही है।
अमेरिका और ईरान के बीच राजनयिक तनाव
यह घटनाक्रम वॉशिंगटन और तेहरान के बीच राजनयिक बातचीत जारी रहने के दौरान हुआ। संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी को हुई जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमले किए। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता, 86 वर्षीय Ayatollah Ali Khamenei मारे गए। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई में कई खाड़ी देशों में अमेरिकी और इजरायली ठिकानों को निशाना बनाया। इसी के बीच हूतियों ने भी अपने दूसरे अभियान की घोषणा कर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ा दिया।
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संघर्ष जारी रहने की आशंका
हूतियों का कहना है कि उनका अभियान पवित्र जिहाद युद्ध का हिस्सा है और इसे तब तक जारी रखा जाएगा जब तक उनके निर्धारित सैन्य उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो जाती। विशेषज्ञों के अनुसार, इस कदम से क्षेत्रीय सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता पर असर पड़ सकता है और पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ सकता है।









