World Water Day: पृथ्वी को उसकी सतह पर मौजूद विशाल जलराशि के कारण ‘नीला ग्रह’ कहा जाता है। ऊपर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ पानी का असीमित भंडार है, लेकिन असलियत इसके ठीक उलट है। विश्व जल दिवस के अवसर पर विशेषज्ञ पवन कौशिक (सह-संस्थापक, गुरुक्षेत्र कंसल्टेंसी) जल उपलब्धता के उन आंकड़ों को सामने रखते हैं, जो हमारी लापरवाही को चुनौती देते हैं।
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क्या है 97%, 2.5% और 0.007% का रहस्य?

पृथ्वी पर पानी की प्रचुरता केवल एक भ्रम है। यदि हम कुल उपलब्ध जल का विश्लेषण करें, तो स्थिति अत्यंत चिंताजनक नजर आती है:
- 97% खारा पानी: पृथ्वी का लगभग 97% जल महासागरों और समुद्रों में है। यह खारा होने के कारण न तो पीने योग्य है और न ही कृषि या उद्योगों के काम आ सकता है।
- 5% मीठा पानी: कुल जल का केवल ढाई प्रतिशत हिस्सा ही ‘मीठा’ या ‘फ्रेश वाटर’ है। लेकिन इसमें भी एक बड़ी बाधा है। इस मीठे पानी का लगभग 68-69% हिस्सा ग्लेशियरों और ध्रुवीय बर्फ के रूप में जमा है, जो हमारी पहुँच से बाहर है।
- भूजल की चुनौती: शेष मीठे पानी का लगभग 30% हिस्सा जमीन के नीचे गहराई में छिपा है। इसे बाहर निकालना तकनीकी रूप से जटिल और आर्थिक रूप से अत्यंत खर्चीला है।
- 007% जीवनरेखा: अंत में हमारे पास केवल 0.3% सतही जल (नदियों, झीलों और तालाबों में) बचता है। वैश्विक संदर्भ में देखें तो यह मात्र 0.007% है। यही वह सूक्ष्म हिस्सा है जिससे दुनिया की 8 अरब आबादी, पूरी खेती और वैश्विक अर्थव्यवस्था टिकी हुई है।
उपलब्धता नहीं, पहुँच की सीमा
पवन कौशिक के अनुसार, असली समस्या पानी की कुल मात्रा नहीं, बल्कि उसकी ‘उपलब्धता’ है। बढ़ती जनसंख्या, अनियंत्रित शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन के कारण इस 0.007% जल पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और भूजल स्तर रसातल में जा रहा है। सबसे बड़ा खतरा वह ‘दृष्टिभ्रम’ है, जिसके कारण लोग पानी को बर्बाद करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह हर जगह मौजूद है।
नीति से अधिक व्यवहार में बदलाव की ज़रूरत
जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संपत्ति है, जो किसी भी देश की खाद्य सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता को तय करती है। इस संकट से निपटने के लिए केवल सरकारी नीतियां काफी नहीं हैं; इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर व्यवहार परिवर्तन अनिवार्य है।
- छोटे कदम, बड़ा प्रभाव: नल के रिसाव को ठीक करना, पानी का पुनर्चक्रण (Recycle) करना और जरूरत भर ही पानी का उपयोग करना जैसे सरल उपाय सामूहिक रूप से बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
- नैतिक जिम्मेदारी: जल संरक्षण केवल संस्थाओं का काम नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का कर्तव्य है। बर्बाद की गई एक-एक बूंद भविष्य के लिए एक बड़े घाटे के समान है।









