जैन साधु क्यों उखाड़ते हैं सिर के बाल? जानें केशलोचन की कठिन साधना का रहस्य

 आज से जैन धर्म का पर्युषण पर्व शुरू हो चुका है. इस महापर्व के दौरान जैन धर्म के लोग पूरी तरह से कठिन तप पर ध्यान केंद्रित करते हैं. वहीं, जैन धर्म में साधु जीवन को त्याग, तपस्या और संयम का मार्ग माना जाता है. इस राह पर चलने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूरी बनाता है. जैन साधु-साध्वियों की जीवनशैली से जुड़ी कई बातें आम लोगों को हैरान कर देती हैं. उन्हीं में से एक है केशलोचन, जिसमें साधु अपने सिर और चेहरे के बाल खुद हाथों से उखाड़ते हैं. यह सुनने में जितना कठिन लगता है, वास्तव

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Published On :

सितम्बर 8, 2026

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 आज से जैन धर्म का पर्युषण पर्व शुरू हो चुका है. इस महापर्व के दौरान जैन धर्म के लोग पूरी तरह से कठिन तप पर ध्यान केंद्रित करते हैं. वहीं, जैन धर्म में साधु जीवन को त्याग, तपस्या और संयम का मार्ग माना जाता है. इस राह पर चलने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूरी बनाता है. जैन साधु-साध्वियों की जीवनशैली से जुड़ी कई बातें आम लोगों को हैरान कर देती हैं. उन्हीं में से एक है केशलोचन, जिसमें साधु अपने सिर और चेहरे के बाल खुद हाथों से उखाड़ते हैं. यह सुनने में जितना कठिन लगता है, वास्तव में यह साधना का बेहद अहम हिस्सा माना जाता है. आखिर साधु ऐसा क्यों करते हैं और इसमें कैंची या ब्लेड का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? आइए जानते हैं.

क्या होता है केशलोचन?
केशलोचन का सीधा अर्थ है बालों को उखाड़ना. जैन परंपरा में जब कोई व्यक्ति सांसारिक जीवन छोड़कर साधु या साध्वी के रूप में दीक्षा लेता है, तब इस प्रक्रिया का विशेष महत्व होता है. साधु अपने सिर और चेहरे के बालों को हाथों से हटाते हैं. यह सिर्फ बाल हटाने की प्रक्रिया नहीं मानी जाती, बल्कि इसे मोह और भौतिक आकर्षण से दूरी बनाने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है.

बालों को कैंची या ब्लेड से क्यों नहीं काटते?
केशलोचन की सबसे खास बात यही है कि इसमें बाल काटने के लिए कैंची, ब्लेड या किसी दूसरे औजार का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. जैन मान्यताओं के अनुसार, इसके पीछे अहिंसा और त्याग से जुड़ी सोच है.

एक मान्यता यह भी है कि किसी औजार के इस्तेमाल से त्वचा पर मौजूद सूक्ष्म यानी छोटे जीवों को नुकसान पहुंच सकता है. इसके अलावा बालों को शरीर की सुंदरता से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए उन्हें खुद से हटाना अपने रूप और शरीर के प्रति मोह को कम करने का एक तरीका माना जाता है.

इतनी पीड़ा सहकर क्यों करते हैं यह साधना?
केशलोचन आसान प्रक्रिया नहीं है. बालों को जड़ से निकालने की वजह से दर्द होना स्वाभाविक है. लेकिन जैन साधु इसे सहन करते हुए अपनी साधना पूरी करते हैं. जैन परंपरा में इसे धैर्य और सहनशीलता की परीक्षा के रूप में भी देखा जाता है. इसका उद्देश्य यह समझना है कि साधु सुख-दुख, आराम और असुविधा जैसी शारीरिक स्थितियों से ऊपर उठकर अपने मन को संयमित रख सके.

दीक्षा के समय इसका क्या महत्व है?
जब कोई व्यक्ति जैन साधु बनने का फैसला करता है, तो वह अपने पुराने सांसारिक जीवन से दूरी बनाने का संकल्प लेता है. दीक्षा के दौरान होने वाला केशलोचन इसी बदलाव का एक प्रतीक माना जाता है.

इसमें व्यक्ति अपने रूप, शरीर और सुविधाओं के प्रति लगाव छोड़ने का संदेश देता है. यानी बाहरी सुंदरता से ज्यादा महत्व आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना को दिया जाता है.

कैसे किया जाता है केशलोचन?
केशलोचन के दौरान साधु या साध्वी धार्मिक वातावरण में बैठकर अपने बालों को हाथों से उखाड़ते हैं. कुछ परंपराओं में वरिष्ठ साधु भी इसमें सहायता करते हैं. इस दौरान मंत्र और धार्मिक वचनों का पाठ किया जाता है. प्रक्रिया पूरी होने के बाद साधु आगे की साधना और संयम के मार्ग पर बढ़ते हैं.

साल में कितनी बार होता है केशलोचन?
जैन परंपरा में केशलोचन साल में एक या दो बार किए जाने की परंपरा बताई गई है. बाहर से देखने पर केशलोचन एक कठिन और दर्दनाक प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन जैन साधना में इसका अर्थ इससे कहीं ज्यादा गहरा है. यह व्यक्ति को याद दिलाता है कि साधु जीवन का उद्देश्य आराम और सुंदरता नहीं, बल्कि त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मअनुशासन है. यही वजह है कि केशलोचन को जैन साधु-साध्वियों की तपस्या और वैराग्य से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपराओं में गिना जाता है.

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