West Bengal SIR: सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत के सामने वोटर लिस्ट में संशोधन की प्रक्रिया, उसकी पारदर्शिता और आम लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल उठे। याचिकाकर्ताओं ने SIR प्रक्रिया को मनमाना और परेशान करने वाला बताते हुए हस्तक्षेप की मांग की।
चुनाव आयोग ने नोटिसों को लेकर दी जानकारी
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि SIR के तहत अब तक लगभग 1.25 करोड़ ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ नोटिस जारी किए गए हैं। आयोग के अनुसार, ये नोटिस उन मामलों में भेजे गए हैं जहां वोटर लिस्ट में दर्ज जानकारी में तर्कसंगत विसंगतियां पाई गई हैं, जैसे पिता और पुत्र की उम्र में असामान्य अंतर या नामों की स्पेलिंग में फर्क, खासकर बंगाली नामों के संदर्भ में।
कपिल सिब्बल ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने SIR की प्रक्रिया पर कड़ा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सिर्फ उम्र के अंतर या नामों की स्पेलिंग में मामूली बदलाव के आधार पर लोगों को नोटिस भेजना अनुचित है। सिब्बल ने मांग की कि जिन लोगों को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के नाम पर नोटिस भेजे गए हैं, उनकी सूची सार्वजनिक की जाए, ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।कपिल सिब्बल ने यह भी कहा कि बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) को सुधार प्रक्रिया में सक्रिय रूप से मदद करनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि आम नागरिकों के लिए दस्तावेज जुटाना और त्रुटियों को समझना आसान नहीं होता, ऐसे में प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को सही जानकारी और सहयोग प्रदान करे।
सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग को सख्त निर्देश
याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को सख्त निर्देश जारी किए। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल तर्क या अनुमान के आधार पर आम नागरिकों को परेशान नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया कि जिन मतदाताओं को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नोटिस भेजे गए हैं, उनकी सूची पंचायत कार्यालयों और ब्लॉक कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से चस्पा की जाए।
पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रिया पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया जरूरी हो सकती है, लेकिन यह पूरी तरह पारदर्शी, समयबद्ध और आम लोगों के लिए सुविधाजनक होनी चाहिए। अदालत ने जोर दिया कि किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया से आम नागरिकों को अनावश्यक असुविधा नहीं होनी चाहिए और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है।चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि SIR के तहत आयोग केवल यह सुनिश्चित करता है कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में शामिल रहने के योग्य है या नहीं। आयोग के मुताबिक, इस प्रक्रिया का उद्देश्य सिर्फ मतदाता की पात्रता और नागरिकता का सत्यापन करना है, न कि किसी को परेशान करना।
डिपोर्टेशन को लेकर फैली आशंकाओं पर जवाब
चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया का किसी भी तरह से डिपोर्टेशन यानी देश से बाहर निकाले जाने से कोई संबंध नहीं है। आयोग ने कहा कि किसी व्यक्ति को देश से बाहर निकालने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, चुनाव आयोग के पास नहीं।इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। अदालत की टिप्पणी ने यह साफ कर दिया है कि वोटर लिस्ट सुधार जरूरी है, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों और आम जनता की सुविधा के साथ किसी भी तरह का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा।










