West Bengal Political History: भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में जहां राज्यों की सत्ता म्यूजिकल चेयर की तरह बदलती रहती है, वहीं पश्चिम बंगाल एक अपवाद बनकर उभरा है। 1977 से लेकर 2026 तक के सफर में इस राज्य ने सत्ता की चाबी केवल तीन चेहरों—ज्योति बसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य और ममता बनर्जी के हाथों में सौंपी है। यह स्थिरता केवल राजनीति नहीं, बल्कि बंगाल के सामाजिक और आर्थिक संघर्षों की एक अनकही दास्तान है।
ज्योति बसु और वामपंथ का उदय
बताते चले कि, 1977 में जब ज्योति बसु ने सत्ता संभाली, तब बंगाल राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। उनके 23 साल के कार्यकाल ने ‘ऑपरेशन बर्गा’ के जरिए भूमि सुधार की एक नई इबारत लिखी, जिससे गरीब किसानों को जमीन का मालिकाना हक मिला। हालांकि, इसी दौर में ‘यूनियन बाजी’ और उद्योगों के पलायन ने राज्य की अर्थव्यवस्था को चोट भी पहुँचाई। बसु का 1996 में प्रधानमंत्री पद के प्रस्ताव को ठुकराना आज भी भारतीय राजनीति की “ऐतिहासिक भूल” मानी जाती है।
बुद्धदेव भट्टाचार्य का विजन
साल 2000 में कमान बुद्धदेव भट्टाचार्य के पास आई, जिन्होंने “ब्रांड बंगाल” को चमकाने के लिए आईटी और भारी उद्योगों का रुख किया। उनका सपना कोलकाता को सिलिकॉन वैली बनाना था, लेकिन टाटा नैनो प्रोजेक्ट के लिए सिंगूर में भूमि अधिग्रहण उनके पतन की पटकथा बन गया। नंदीग्राम की हिंसा और किसानों के विरोध ने 34 साल पुराने वामपंथी किले की दीवारें ढहा दीं और राज्य को एक नए नेतृत्व की ओर धकेल दिया।
ममता बनर्जी का ‘परिवर्तन’
2011 में ममता बनर्जी ने ‘परिवर्तन’ के वादे के साथ बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत की। कन्याश्री और ‘दुआरे सरकार’ जैसी जन-कल्याणकारी योजनाओं ने उन्हें महिलाओं और ग्रामीण आबादी का मसीहा बना दिया। हालाँकि, उनके शासनकाल में शारदा घोटाला और भर्ती विवादों ने विपक्ष को हमलावर होने का मौका दिया। 2021 के बाद से भाजपा के उभार ने बंगाल के मुकाबले को और भी दिलचस्प और सीधा बना दिया है।
2026 का चुनावी रण
आज पश्चिम बंगाल एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। क्या 2026 का चुनाव इस 50 साल पुराने ‘तीन मुख्यमंत्री’ वाले तिलस्म को तोड़ेगा या ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाए रखेंगी? भाजपा की आक्रामक रणनीति और वाम-कांग्रेस गठबंधन की वापसी की कोशिशों के बीच, बंगाल की जनता एक बार फिर विचारधारा और विकास के बीच संतुलन तलाश रही है।










