TMC Manas Bhunia Resigns: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) का आंतरिक संकट और गहराता जा रहा है। संकटों के भंवर में फंसी ममता बनर्जी को अब तक का सबसे बड़ा और आत्मघाती झटका लगा है। पार्टी के कद्दावर नेता, पूर्व कैबिनेट मंत्री और सात बार के पूर्व विधायक रह चुके मानस भुइंया ने टीएमसी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। भुइंया ने अपना आधिकारिक त्यागपत्र सीधे पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी को भेजा है। उन्होंने संगठन के शीर्ष नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि वे जिन राजनैतिक आदर्शों और जनहित की नीतियों को देखकर इस दल में शामिल हुए थे, टीएमसी अब उन बुनियादी सिद्धांतों को पूरी तरह तिलांजलि दे चुकी है। हालांकि, अन्य बागी नेताओं के उलट उन्होंने ममता बनर्जी या उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी पर कोई भी सीधा व्यक्तिगत हमला करने से परहेज किया।
मिदनापुर के सियासी गलियारों में हलचल
बताते चले कि, तृणमूल कांग्रेस से नाता तोड़ने के तुरंत बाद मीडियाकर्मियों से मुखातिब होते हुए मानस भुइंया ने अपने भविष्य के राजनैतिक इरादे पूरी तरह साफ कर दिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे भले ही टीएमसी छोड़ रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन और सक्रिय राजनीति को अलविदा नहीं कह रहे हैं। वे जनता के बीच लगातार सक्रिय बने रहेंगे। हालांकि, उन्होंने अपनी आगामी रणनीति और भविष्य के पत्तों का पूरी तरह खुलासा नहीं किया, जिससे बंगाल के सियासी गलियारों में कयासों का बाजार बेहद गर्म हो गया है। वरिष्ठ राजनैतिक विश्लेषकों का साफ तौर पर मानना है कि मिदनापुर के यह कद्दावर नेता या तो अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस में घर वापसी कर सकते हैं या फिर राज्य में तेजी से उभर रहे मुख्य विरोधी खेमे (BJP-NDA) का दामन थाम सकते हैं।
सबांग विधानसभा क्षेत्र के सबसे असरदार चेहरे का इतिहास
आपको बता दे कि, अविभाजित मिदनापुर जिले की क्षेत्रीय राजनीति में मानस भुइंया का नाम बेहद सम्मान और धमक के साथ लिया जाता है। उन्होंने दशकों तक सबांग विधानसभा क्षेत्र का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया और वहां के सबसे मजबूत जमीनी चेहरे बने रहे। तृणमूल में आने से पहले कांग्रेस में एक लंबा और शानदार वक्त गुजारने के दौरान वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके थे। साल 2016 में वे ममता बनर्जी के विकास कार्यों और नीतियों से प्रभावित होकर टीएमसी में शामिल हुए थे। उनके आने से समूचे मिदनापुर बेल्ट में तृणमूल कांग्रेस को एक अभूतपूर्व संगठनात्मक मजबूती मिली थी, जिसके बाद ममता ने उन्हें अपनी कैबिनेट में जल संसाधन मंत्री जैसी बड़ी जिम्मेदारी भी सौंपी थी। हालांकि, इस बार के विधानसभा चुनाव में उन्हें अपनी पारंपरिक सबांग सीट से अप्रत्याशित हार का मुंह देखना पड़ा था।
संगठन और सरकार दोनों मोर्चों पर ममता बनर्जी अलग-थलग
मानस भुइंया का यह बहुचर्चित इस्तीफा एक ऐसे नाजुक और ऐतिहासिक मोड़ पर आया है, जब टीएमसी अपने राजनैतिक वजूद की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। संसद से लेकर कोलकाता की सड़कों तक ममता बनर्जी की प्रशासनिक और सांगठनिक पकड़ ढीली होती जा रही है। लोकसभा में पार्टी के 28 सांसदों में से 20 सांसद पहले ही बगावत का झंडा बुलंद कर अलग गुट बना चुके हैं, जिसके चलते ममता के पाले में अब सिर्फ आठ वफादार सांसद ही बचे हैं। इसके अलावा, चार राज्यसभा सांसद भी पहले ही उच्च सदन से इस्तीफा दे चुके हैं।
अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर उठे सवाल
संसद के साथ-साथ पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर भी बगावत की यह आग पूरी तरह भड़क चुकी है। सदन में बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने खुलेआम एलान कर दिया है कि वे व्यक्तिगत रूप से ममता दीदी का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन पार्टी के भीतर राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की तानाशाही और मनमानी के लिए अब कोई जगह नहीं है। वर्तमान में ऋतब्रत बनर्जी के साथ टीएमसी के करीब 60 विधायकों का खुला समर्थन हासिल है। यह पूरा विद्रोही गुट ममता बनर्जी को राजनैतिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग करने और राज्य की सत्ता से बेदखल करने के अचूक चक्रव्यूह के निर्माण में जुटा हुआ है।








