WB Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस वक्त जबरदस्त हलचल मच गई जब मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी ने आगामी विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी। कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ममता बनर्जी ने घोषणा की कि उनकी पार्टी बंगाल की सभी 294 विधानसभा सीटों पर बिना किसी गठबंधन के अकेले चुनाव मैदान में उतरेगी। इस फैसले ने न केवल ‘INDIA’ गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि राज्य के चुनावी समीकरणों को भी पूरी तरह बदल दिया है।
विपक्षी एकता को बड़ा झटका और ‘एकला चलो’ की नीति
ममता बनर्जी का यह निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ बन रहे विपक्षी मोर्चे के लिए एक बड़ा अवरोध माना जा रहा है। काफी समय से चर्चा थी कि कांग्रेस और वामदल (लेफ्ट) के साथ मिलकर टीएमसी भाजपा को चुनौती देगी। लेकिन ममता बनर्जी ने ‘एकला चलो’ के अपने पुराने फार्मूले पर भरोसा जताते हुए इन सभी अटकलों को खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया है कि बंगाल की जमीन पर वे किसी भी राष्ट्रीय दल के साथ शक्ति साझा करने के मूड में नहीं हैं।
रणनीतिक फैसला: क्षेत्रीय अस्मिता और सीटों का गणित
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, ममता बनर्जी के इस साहसिक कदम के पीछे सोची-समझी रणनीति काम कर रही है। सबसे बड़ा कारण क्षेत्रीय अस्मिता है; ममता खुद को बंगाल की एकमात्र रक्षक के रूप में पेश करना चाहती हैं। दूसरा प्रमुख कारण सीटों का बंटवारा है। गठबंधन की स्थिति में टीएमसी को कांग्रेस और लेफ्ट के लिए करीब 70-80 सीटें छोड़नी पड़तीं, जिससे पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष फैलने का डर था। ममता को विश्वास है कि टीएमसी का संगठन अपने दम पर जीत हासिल करने में सक्षम है।
त्रिकोणीय मुकाबले से ध्रुवीकरण की उम्मीद
ममता बनर्जी के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि मुकाबला त्रिकोणीय (TMC बनाम BJP बनाम कांग्रेस-लेफ्ट) होता है, तो सत्ता विरोधी वोटों का बिखराव होगा, जिसका सीधा लाभ टीएमसी को मिल सकता है। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में वोटों का ध्रुवीकरण ममता बनर्जी के पक्ष में होने की संभावना बढ़ जाती है। ममता को लगता है कि गठबंधन न करने से वे कांग्रेस और लेफ्ट की गलतियों का बोझ उठाने से भी बच जाएंगी।
विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रिया और बीजेपी का तंज
ममता बनर्जी के इस ऐलान पर भारतीय जनता पार्टी ने तंज कसते हुए इसे ‘डर का नतीजा’ बताया है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि दीदी को अपने सहयोगियों पर भरोसा नहीं रहा और वे अपनी डूबती नैया बचाने की कोशिश कर रही हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने इस फैसले को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ करार दिया है। कांग्रेस का मानना है कि विपक्ष के बंटने से अंततः बीजेपी को फायदा होगा, जो कि सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लक्ष्य के विपरीत है।
मिशन 2026: चौथी बार सत्ता में वापसी की चुनौती
2026 के विधानसभा चुनाव में कुल 294 सीटों के लिए मतदान होगा, जहां बहुमत का जादुई आंकड़ा 148 है। टीएमसी ने इस बार ‘215+’ सीटों का लक्ष्य रखा है, ताकि लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी कर एक नया रिकॉर्ड बनाया जा सके। दूसरी ओर, भाजपा भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों को लेकर ‘सोनार बांग्ला’ के नारे के साथ सत्ता परिवर्तन का दावा कर रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी का यह दांव उन्हें फिर से सत्ता की कुर्सी दिलाता है या विपक्ष का बिखराव बीजेपी के लिए राह आसान करता है।
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