US Iran Tension: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। हाल ही में इस्लामाबाद में हुई एक शांति वार्ता के बाद मुनीर ने खुद को एक मध्यस्थ और “शांतिदूत” के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की, लेकिन उनकी यह भूमिका विवादों में आ गई है।
इस्लामाबाद वार्ता और असफल प्रयास

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच एक महत्वपूर्ण बातचीत आयोजित की गई थी। इस बैठक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर भी मौजूद थे। हालांकि, यह वार्ता किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी और बिना समझौते के समाप्त हो गई। इसके बाद सवाल उठने लगे कि क्या पाकिस्तान वास्तव में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है या यह केवल एक कूटनीतिक प्रयास था।
ईरान से आसिम मुनीर के पुराने संबंध
रिपोर्ट्स के अनुसार, जनरल आसिम मुनीर के ईरान के साथ संबंध नए नहीं हैं। वर्ष 2016-17 के दौरान जब वे पाकिस्तान की मिलिट्री इंटेलिजेंस के प्रमुख थे, तब उन्होंने ईरानी सेना और खुफिया एजेंसियों के साथ संपर्क स्थापित किए थे। इसके अलावा, उनका संबंध ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के साथ भी बताया जाता है। रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि उनके संपर्क IRGC के वरिष्ठ कमांडरों कासिम सुलेमानी और हुसैन सलामी तक रहे हैं।
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अमेरिका की चिंता और ‘रेड फ्लैग’ बयान

अमेरिका से जुड़े रक्षा विशेषज्ञों ने पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के सीनियर फेलो बिल रोगियो ने कहा कि अमेरिका को पाकिस्तान पर पूरी तरह भरोसा नहीं करना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से आसिम मुनीर के IRGC से संबंधों को “रेड फ्लैग” यानी गंभीर चेतावनी संकेत बताया है। उनके अनुसार, ऐसे संबंध अमेरिका की सुरक्षा और कूटनीतिक हितों के लिए चिंता का विषय हो सकते हैं।
पाकिस्तान की मध्यस्थ बनने की कोशिश
रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान ने इस पूरे विवाद में खुद को एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। इस प्रक्रिया में जनरल आसिम मुनीर की भूमिका प्रमुख रही।हाल ही में उन्होंने तीन दिवसीय ईरान दौरा भी किया, जहां उन्होंने शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेताओं से मुलाकात की। पाकिस्तान सेना के बयान में कहा गया कि यह दौरा अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया था।
कूटनीति या रणनीतिक दांव?
हालांकि पाकिस्तान का दावा है कि वह शांति प्रक्रिया में मदद कर रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इसे लेकर आशंकित हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास हो सकता है।









