US Iran Sanctions: ओमान की राजधानी मस्कट में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हाल ही में हुई अप्रत्यक्ष बातचीत के बावजूद, वाशिंगटन ने एक बेहद सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ (अधिकतम दबाव) नीति के तहत, अमेरिका ने ईरान के तेल निर्यात को पूरी तरह से शून्य पर लाने के उद्देश्य से नए आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की है। इस कदम ने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, क्योंकि ईरान को उम्मीद थी कि बातचीत से तनाव कम होगा। अमेरिका का स्पष्ट मानना है कि तेहरान की आय के स्रोतों को पूरी तरह बंद करना ही उसे परमाणु कार्यक्रम पर समझौता करने के लिए मजबूर करने का एकमात्र रास्ता है।
प्रतिबंधों का व्यापक जाल: जहाज, कंपनियां और व्यक्ति निशाने पर
अमेरिकी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी ताजा सूची में इन प्रतिबंधों का दायरा काफी विस्तृत रखा गया है। इसके तहत कुल 14 तेल टैंकरों (जहाजों), 15 अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और 2 प्रमुख व्यक्तियों को काली सूची में डाल दिया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिन जहाजों पर प्रतिबंध लगाया गया है, उनमें भारत, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों के झंडे लगे हुए हैं। इन पर आरोप है कि वे अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर अवैध रूप से ईरानी कच्चे तेल का परिवहन कर रहे थे। अब इन संस्थाओं के साथ किसी भी प्रकार का व्यापार करना अमेरिकी कानून के तहत दंडनीय अपराध माना जाएगा।
ईरान की उम्मीदों को झटका: कूटनीति बनाम दबाव की राजनीति
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल ही में मस्कट वार्ता को ‘सकारात्मक’ करार देते हुए तनाव कम होने की उम्मीद जताई थी। हालांकि, अमेरिका ने इन प्रतिबंधों के जरिए यह संदेश दे दिया है कि वह केवल बातचीत के भरोसे बैठने वाला नहीं है। विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि अमेरिका एक ‘दोहरी रणनीति’ पर काम कर रहा है—एक तरफ वह बातचीत का दरवाजा खुला रखता है, तो दूसरी तरफ आर्थिक कमर तोड़कर ईरान को झुकने पर मजबूर करता है। तेहरान के लिए यह स्थिति काफी निराशाजनक है, क्योंकि वहां की अर्थव्यवस्था पहले से ही चरमराई हुई है।
धन के स्रोत पर प्रहार: अस्थिरता रोकने का अमेरिकी तर्क
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने आधिकारिक बयान में कहा है कि ईरान अपने तेल निर्यात से प्राप्त होने वाली आय का बड़ा हिस्सा वैश्विक स्तर पर अस्थिरता फैलाने और अपने परमाणु महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में खर्च करता है। इन नए प्रतिबंधों का प्राथमिक लक्ष्य ईरान की सैन्य शक्ति और परमाणु अनुसंधान के वित्तपोषण (Funding) को पूरी तरह रोकना है। इतना ही नहीं, अमेरिका ने ईरानी तटों के पास अपनी नौसैनिक उपस्थिति भी बढ़ा दी है, जिससे इस क्षेत्र में सीधे सैन्य संघर्ष की आशंका पहले से कहीं अधिक प्रबल हो गई है।
वैश्विक बाजार पर असर और ईरान का भविष्य
ईरान वर्तमान में अपनी मुद्रा के गिरते मूल्य और घरेलू असंतोष से जूझ रहा है। वाशिंगटन की नीति का वैश्विक प्रभाव यह होगा कि अब कोई भी देश या कंपनी प्रतिबंधों के डर से ईरान से तेल खरीदने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगी। यदि मस्कट में होने वाली भविष्य की बातचीत पूरी तरह विफल रहती है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। साथ ही, ईरान के भीतर मानवाधिकारों के मुद्दे पर भी अमेरिका ने अपना रुख कड़ा कर लिया है, जिससे ईरान की वर्तमान सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ती दिख रही है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर हैं कि तेहरान इन आर्थिक बेड़ियों का सामना कैसे करता है।










