US Dollar: 165 साल पुरानी परंपरा खत्म, अब अमेरिकी डॉलर पर होंगे डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर

अमेरिकी अर्थव्यवस्था की धुरी माने जाने वाले 'डॉलर' में 165 साल बाद एक ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है। अमेरिका की आजादी की 250वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में अब नोटों पर 'ट्रेजरर' की जगह खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर (Signature) नजर आएंगे।

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

मार्च 27, 2026

US Dollar: अमेरिकी मुद्रा यानी ‘ग्रीनबैक’ को लेकर इन दिनों एक बड़ी चर्चा अंतरराष्ट्रीय गलियारों में गर्म है। दावा किया जा रहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ऐसा ‘पावर मूव’ चलने जा रहे हैं, जो अमेरिकी डॉलर के इतिहास को बदल कर रख देगा। अमेरिका की आजादी की 250वीं वर्षगांठ के अवसर पर डॉलर के नोटों पर राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर (Signature) होने की खबरें सामने आ रही हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह पिछले 165 वर्षों में अपनी तरह का पहला बदलाव होगा।

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165 साल पुरानी परंपरा और मौजूदा नियम

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अब अमेरिकी डॉलर पर होंगे डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर

अमेरिकी डॉलर के इतिहास पर नजर डालें तो 1861 से एक तय परंपरा चली आ रही है। वर्तमान में डॉलर के नोटों पर मुख्य रूप से ‘ट्रेजरर ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स’ (Treasurer of the United States) और ‘सेक्रेटरी ऑफ द ट्रेजरी’ के हस्ताक्षर होते हैं।

ऐतिहासिक बदलाव: पिछले डेढ़ सौ से अधिक वर्षों में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने मुद्रा पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

दावे का आधार: ब्रैंडन बीच और स्कॉट बेसेंट जैसे प्रमुख व्यक्तित्वों के बयानों ने इस चर्चा को हवा दी है। उनका तर्क है कि ट्रंप के हस्ताक्षर देश की आर्थिक उपलब्धियों और उनकी मजबूत लीडरशिप का प्रतीक बनेंगे।

डोनाल्ड ट्रंप के चेहरे वाला ‘गोल्ड कॉइन’

नोटों पर हस्ताक्षर के साथ-साथ एक और विशेष घोषणा चर्चा में है। अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ को यादगार बनाने के लिए 24 कैरेट सोने का एक खास सिक्का जारी करने की तैयारी है।

विशेषता: इस सोने के सिक्के पर डोनाल्ड ट्रंप की तस्वीर अंकित होगी।

उद्देश्य: इसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती और ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के जश्न के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि करेंसी में ऐसे बदलावों के लिए बहुत सख्त कानूनी प्रक्रियाओं और आधिकारिक ट्रेजरी घोषणाओं की आवश्यकता होती है, जिनका अभी इंतजार है।

आखिर क्यों इतना पावरफुल है अमेरिकी डॉलर?

दुनिया भर की नजरें इस बदलाव पर इसलिए हैं क्योंकि यूएस डॉलर महज एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति का प्रतीक है। इसकी मजबूती के पीछे तीन मुख्य स्तंभ हैं:

रिजर्व करेंसी: दुनिया के अधिकांश केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) का सबसे बड़ा हिस्सा डॉलर में रखते हैं, जो इसे सबसे भरोसेमंद मुद्रा बनाता है।

पेट्रोडॉलर सिस्टम: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) और सोने जैसे बड़े जिंसों का व्यापार मुख्य रूप से डॉलर में होता है। यदि किसी देश को तेल खरीदना है, तो उसे डॉलर की जरूरत पड़ती ही है।

वैश्विक स्वीकार्यता: अंतरराष्ट्रीय व्यापार का अधिकांश हिस्सा डॉलर में होने के कारण इसकी तरलता (Liquidity) दुनिया में सबसे अधिक है।

क्या यह केवल एक राजनीतिक कदम है?

आलोचकों और समर्थकों के बीच इस पर बहस छिड़ी हुई है। जहाँ समर्थक इसे अमेरिकी गौरव का पुनरुत्थान मान रहे हैं, वहीं वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि करेंसी के डिजाइन में बदलाव वैश्विक बाजार में डॉलर की छवि को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल, अमेरिकी ट्रेजरी की ओर से इस पर किसी अंतिम मुहर का इंतजार किया जा रहा है।

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