Bihar Politics : क्या भाजपा में विलीन होगी कुशवाहा की पार्टी? राज्यसभा चुनाव के बीच सियासी डील!

बिहार की सियासत में उस वक्त भूकंप आ गया जब उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी RLM के भाजपा में विलय की खबरें तेज हो गईं। राज्यसभा चुनाव और आगामी कैबिनेट विस्तार के बीच भाजपा की एक 'खास शर्त' ने कुशवाहा को धर्मसंकट में डाल दिया है। क्या कुशवाहा अपनी पार्टी का अस्तित्व खत्म करेंगे?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 27, 2026

Bihar Politics : बिहार के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या उपेंद्र कुशवाहा अपनी पार्टी ‘राष्ट्रीय लोक मोर्चा’ (RLM) का भारतीय जनता पार्टी में विलय करेंगे? राज्य में संभावित कैबिनेट विस्तार से ठीक पहले यह चर्चा काफी तेज हो गई है। सूत्रों की मानें तो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद बिहार मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है। इसी विस्तार से पहले भाजपा ने कुशवाहा के सामने अपनी पार्टी के अस्तित्व को भाजपा में समाहित करने का प्रस्ताव रखा है। अब उपेंद्र कुशवाहा के लिए यह तय करना मुश्किल हो गया है कि वे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखें या सत्ता के बड़े ढांचे का हिस्सा बनें।

राज्यसभा का दांव और भाजपा की शर्तें: भविष्य की बिसात

राजनीतिक विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में हार के बावजूद भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा पर भरोसा जताया और उन्हें राज्यसभा भेजा। इसके पीछे 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए के समीकरणों को दुरुस्त रखना मुख्य उद्देश्य था। मार्च 2026 में कुशवाहा का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने पर एनडीए ने उन्हें दोबारा मौका दिया। माना जा रहा है कि इस उदारता के पीछे यह गुप्त शर्त हो सकती है कि वे अपनी पार्टी को भाजपा में मिला लें। हालांकि, आधिकारिक तौर पर अभी किसी भी पक्ष ने इस ‘विलय’ की पुष्टि नहीं की है, लेकिन दिल्ली में भाजपा आलाकमान के साथ कुशवाहा की हालिया बैठकें कुछ और ही संकेत दे रही हैं।

पुत्र मोह और उत्तराधिकारी की जंग: क्या सुरक्षित होगा दीपक प्रकाश का भविष्य?

इस संभावित विलय के पीछे एक बड़ा कारण पारिवारिक हित भी माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे दीपक प्रकाश के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने की जुगत में हैं। वे चाहते हैं कि उनके बेटे को बिहार विधान परिषद (MLC) में जगह मिले या मंत्रिमंडल में कोई अहम पद प्राप्त हो। अपनी पार्टी के अकेले दम पर यह लक्ष्य हासिल करना कठिन लग रहा है, इसलिए भाजपा के साथ विलय एक रणनीतिक कदम हो सकता है। हालांकि, यदि वे विलय करते हैं, तो उनका अपना क्षेत्रीय दल सदा के लिए समाप्त हो जाएगा, जिससे उनके निष्ठावान कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा होना तय है।

पार्टी के भीतर बगावत: ‘लिट्टी-चोखा पार्टी’ से उपजा असंतोष

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। नवंबर 2025 में जब कुशवाहा ने अपने बेटे को मंत्री बनाने की कोशिश की, तो पार्टी के विधायक और कार्यकर्ता भड़क गए। उनका आरोप था कि जो सदस्य सदन का हिस्सा नहीं है, उसे तरजीह क्यों दी जा रही है। दरार तब और चौड़ी हो गई जब कुशवाहा के आवास पर आयोजित ‘लिट्टी-चोखा पार्टी’ से तीन प्रमुख विधायक—रामेश्वर महतो, आलोक सिंह और आनंद माधव गायब रहे। विधायकों का आरोप है कि पार्टी में तानाशाही चल रही है और अहम फैसलों में उनकी अनदेखी की जाती है। डैमेज कंट्रोल के लिए आलोक सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन नाराजगी बरकरार है।

भाजपा के साथ तालमेल: मजबूरी या मास्टरस्ट्रोक?

वर्तमान में विधानसभा में RLM के 4 विधायक हैं, जिनमें कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता भी शामिल हैं। अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाए रखने और बेटे के भविष्य को संवारने के लिए भाजपा का साथ देना उनकी मजबूरी नजर आती है। उपेंद्र कुशवाहा पहले भी अपनी पार्टी का जदयू में विलय कर चुके हैं, लेकिन नीतीश कुमार से अनबन के बाद 2023 में उन्होंने नई राह चुनी थी। अब देखना यह है कि क्या वे इतिहास दोहराते हुए फिर से अपनी पार्टी का विलय करते हैं या कोई नया राजनीतिक प्रयोग करेंगे। यदि विधायकों की नाराजगी नहीं थमी, तो पार्टी में टूट की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

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