UP Politics: 2027 में वापसी के लिए मायावती को करना होगा बड़ा बदलाव, सोशल इंजीनियरिंग बनेगी कुंजी

2007 में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ से सत्ता हासिल करने वाली BSP के सामने 2027 से पहले सोशल इंजीनियरिंग को दोबारा मजबूत करने की बड़ी चुनौती है।

UP Politics

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

अगस्त 16, 2026

UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए साल 2027 का विधानसभा चुनाव अस्तित्व और पुनरुत्थान की एक बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है। साल 2007 में मायावती ने ‘दलित-ब्राह्मण’ के मजबूत गठजोड़ (सोशल इंजीनियरिंग) के बल पर अपने दम पर उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में लगातार चुनावी हार और पार्टी के जनाधार में आई गिरावट के चलते वह राजनीतिक समीकरण बिखर चुका है। अब 2027 के चुनाव से पहले बसपा के सामने उसी ऐतिहासिक सामाजिक गठजोड़ को दोबारा जमीन पर उतारने और कार्यकर्ताओं का टूटा हुआ भरोसा वापस पाने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

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ब्राह्मण चेहरों की गैरमौजूदगी और नेतृत्व का संकट

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि 2007 में बसपा की जीत के पीछे ब्राह्मण मतदाताओं के बड़े वर्ग का समर्थन मुख्य कारक था। उस वक्त पार्टी ने दलित आधार वोट बैंक के साथ सवर्ण जातियों, विशेषकर ब्राह्मण समाज को जोड़कर एक व्यापक सियासी ताना-बाना बुना था।

वर्तमान में बसपा के सामने केवल नए ब्राह्मण चेहरों को आगे लाने की ही चुनौती नहीं है, बल्कि समाज के भीतर उस पुराने भरोसे और जुड़ाव को फिर से बहाल करने की भी बड़ी जिम्मेदारी है। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना इस समय सबसे अहम और जटिल कार्य है।

पार्टी से दूर हुए प्रमुख ब्राह्मण चेहरे

पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो बसपा के कई कद्दावर और प्रभावी ब्राह्मण चेहरे पार्टी से या तो निष्कासित किए गए या उन्होंने खुद दूरी बना ली।

प्रमुख नाम: हाल ही में अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया। इनसे पहले राकेशधर त्रिपाठी, रंगनाथ मिश्रा, रामू द्विवेदी, कुशल तिवारी, विनय शंकर तिवारी, ब्रजेश पाठक और गुड्डू त्रिपाठी जैसे कई कद्दावर नेता बसपा का साथ छोड़ चुके हैं।

प्रभाव: इसके अलावा, रामवीर उपाध्याय का परिवार भी एक समय बसपा की रीढ़ हुआ करता था। इनमें से अधिकांश नेता अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों में शामिल हो गए और कुछ ने तो सरकारों में मंत्री पद तक हासिल किए। वर्तमान समय में पार्टी के भीतर सतीश चंद्र मिश्रा ही एक ऐसे मुख्य ब्राह्मण चेहरे के रूप में डटे हुए हैं जो लगातार पार्टी के साथ मजबूती से खड़े हैं।

मायावती का पलटवार और युवाओं पर दांव

पार्टी से नेताओं के लगातार जाने और विपक्ष के हमलों पर बसपा सुप्रीमो मायावती का स्पष्ट रुख रहा है। उनका कहना है कि जो लोग निजी स्वार्थ के चलते दल बदलकर दूसरे दलों में चले गए, उनके समर्पण और निष्ठा की पोल उनके खुद के कार्य खोलते हैं। मायावती के अनुसार, ऐसे कई नेताओं ने बसपा सरकार के कार्यकाल के दौरान भी समाज के हितों के बजाय केवल अपने और अपने परिवार के निजी हितों को प्राथमिकता दी थी।

मायावती ने यह भी दावा किया है कि बसपा की कैडर आधारित राजनीति में वरिष्ठ और निष्ठावान नेता लगातार नए, कर्मठ तथा समर्पित कार्यकर्ताओं और युवाओं की फौज तैयार कर रहे हैं। पार्टी की यह ‘नर्सरी’ लगातार सक्रिय है और संगठन के विस्तार के लिए नए चेहरों को आगे लाया जा रहा है।

विश्लेषकों और निष्कासित नेताओं के अपने तर्क

दूसरी ओर, हाल ही में निष्कासित हुए नेता अनंत मिश्रा का मानना है कि 2007 की सफलता के पीछे सतीश मिश्रा की रणनीति, मायावती के प्रति समाज का अटूट विश्वास और जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत थी। उन्होंने कहा कि उस दौर में ब्राह्मण समाज को वास्तविक राजनीतिक सम्मान और हिस्सेदारी मिली थी। उन्होंने सुझाव दिया कि पार्टी नेतृत्व को लगातार गिरते चुनावी ग्राफ पर आत्मचिंतन करना चाहिए।

राजनीतिक जानकारों का भी यही मानना है कि 2027 की वैतरणी पार करने के लिए मायावती को केवल एक वर्ग पर निर्भर रहने के बजाय सभी जातियों और समुदायों के बीच एक नया और प्रभावी संतुलन साधना होगा, तभी पार्टी मुकाबले में टिक सकेगी।

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