UP Politics: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन प्रदेश का सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने ‘बाटी-चोखा’ के बहाने एक नया राजनीतिक कार्ड खेला है, जिसे जानकार ब्राह्मण मतदाताओं को रिझाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। हाल ही में भाजपा के भीतर हुई एक जातिगत बैठक पर उपजे विवाद को अखिलेश यादव ने सामाजिक मेल-जोल और पारंपरिक खान-पान के अपमान से जोड़कर भाजपा को घेरना शुरू कर दिया है।
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ब्राह्मण विधायकों को मिली चेतावनी
बताते चले कि, उत्तर प्रदेश भाजपा में आंतरिक कलह उस समय सतह पर आ गई जब दिसंबर में हुई ब्राह्मण समुदाय की एक बैठक पर पार्टी आलाकमान ने कड़ा रुख अपनाया। इस बैठक में भाजपा के कई ब्राह्मण विधायक और पार्षद शामिल हुए थे, जहां समाज की समस्याओं के साथ-साथ ‘बाटी-चोखा’ भोज का आनंद लिया गया था। जब इसकी सूचना प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी तक पहुंची, तो उन्होंने इसे अनुशासनहीनता करार देते हुए विधायकों को ऐसी जाति आधारित सभाओं से दूर रहने की सख्त चेतावनी दी। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि इस तरह की बैठकें पार्टी की सर्वसमावेशी छवि को नुकसान पहुंचाती हैं।
बाटी-चोखा पार्टी के जरिए सियासी पैंतरेबाजी
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने भाजपा की इस आंतरिक सख्ती को ओछी राजनीति और खान-पान पर बंदिश का नाम देकर मुद्दा बना दिया है। अखिलेश यादव ने पंकज चौधरी की चेतावनी पर तंज कसते हुए कहा कि भाजपा को असल परेशानी बैठक से नहीं, बल्कि ‘बाटी-चोखा’ के बहाने होने वाले सामाजिक जुड़ाव से है। इसी के विरोध में और ब्राह्मण वर्ग की नाराजगी का लाभ उठाने के लिए अखिलेश ने 1 जनवरी 2026 को लखनऊ में एक विशाल ‘बाटी-चोखा पार्टी’ का आयोजन किया। इस आयोजन में सपा के दिग्गज नेताओं सहित बड़ी संख्या में आम लोगों को आमंत्रित कर उन्होंने एकजुटता का संदेश दिया।
पूर्वांचल के पारंपरिक व्यंजन पर छिड़ी जंग
अखिलेश यादव ने इस भोज के दौरान भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पूर्वांचल और बिहार का लोकप्रिय व्यंजन बाटी-चोखा केवल भोजन नहीं, बल्कि एक संस्कृति है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भाजपा अब यह तय करेगी कि ब्राह्मण क्या खाएंगे और किससे मिलेंगे? समाजवादी विचारधारा और सामाजिक समरसता का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी सभी वर्गों को साथ लेकर चलती है और किसी के खान-पान या मेल-जोल पर पाबंदी नहीं लगाती। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सीधे तौर पर उन ब्राह्मणों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश है, जो भाजपा के सख्त रवैये से खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
वाराणसी से गोरखपुर तक स्वाद का सियासी सफर
मूल रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का पारंपरिक भोजन माना जाने वाला बाटी-चोखा (या लिट्टी-चोखा) उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया नहीं है। सत्तू भरी गेहूं की बाटी और भुनी सब्जियों से तैयार चोखा वाराणसी, गोरखपुर और बलिया जैसे जिलों में बेहद पसंद किया जाता है। अब यही सादा भोजन यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की बिसात पर एक बड़ा मोहरा बन चुका है। भाजपा जहाँ इसे जातिवाद का रूप बता रही है, वहीं समाजवादी पार्टी इसे लोक-परंपरा के सम्मान के रूप में पेश कर रही है ताकि पूर्वांचल और ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके।










