UP News: ‘मेरे बाद कौन करेगा?’डर में बुजुर्ग ने जीते जी कर डाली तेरहवीं, जानें पूरा मामला

मरने के बाद क्या होगा, कौन करेगा अंतिम संस्कार और तेरहवीं—इसी डर ने 64 साल के बुजुर्ग को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया जिसे जानकर हर कोई हैरान है, जानिए क्यों उन्होंने जीते जी अपनी तेरहवीं कर डाली और क्या है इसके पीछे की पूरी कहानी

बुजुर्ग ने जीते जी कर डाली तेरहवीं

Wrriten By :

Neha Mishra

Published On :

अप्रैल 1, 2026

UP News: यूपी के औरेया जिले से एक बेहद ही हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां 64 साल के एक बुजुर्ग ने अपने मरने के बाद होने वाली रस्म तेरहवी को जीते ही संपन्न कर दिया। इस आसामन्य आयोजन ने पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना दिया है। इस पहल के पीछे उनकी गहरी चिंता और अकेलेपव की भावना छिपी हुई है। बुजुर्ग का मानना है कि आज के समय में रिश्तों में पहले जैसा भरोसा नहीं रहा, और उन्हें यह डर सताता था कि उनके निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार और तेरहवीं जैसी रस्में ठीक से निभाई जाएंगी या नहीं।

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खुद की जिम्मेदारी खुद उठाने का फैसला

आपको बता दें कि, इस अनोखे आयोजन को करने वाले बुजुर्ग ने किसी पर निर्भर रहने के बजाय खुद ही अपनी तेरहनीं करने का निर्णय लिया। उन्होंने इस बात की पुष्टि की उन्हें अपने रिश्तेदारों या परिचितों पर भरोसा नहीं है कि वे उनके जाने के बाद उनकी जिम्मेदारियां निभाएंगे। इसी सोच के चलते उन्होंने अपनी जिंदगी में ही यह रस्म पूरी करने की ठानी, ताकि बाद में किसी पर बोझ न बनना पड़े और उनकी अंतिम इच्छाएं अधूरी न रहें।

मेहनत की कमाई से किया भव्य आयोजन

इस कार्यक्रम की खास बात यह रही कि इसके लिए उन्होंने किसी से आर्थिक सहायता नहीं ली। उन्होंने अपनी वृद्धावस्था पेंशन और वर्षों की मेहनत से जोड़ी गई बचत से पूरा खर्च उठाया। आयोजन को पूरी तरह पारंपरिक ढंग से किया गया—निमंत्रण पत्र छपवाए गए और गांव के लोगों सहित रिश्तेदारों को आमंत्रित किया गया। यह आयोजन किसी साधारण भोज की तरह नहीं, बल्कि पूरी श्रद्धा और व्यवस्था के साथ आयोजित किया गया था।

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1900 लोगों के लिए भंडारे का आयोजन

1900 लोगों के लिए भंडारे का आयोजन
1900 लोगों के लिए भंडारे का आयोजन

इस ‘जिंदा तेरहवीं’ में लगभग 1900 लोगों को आमंत्रित किया गया, जो अपने आप में एक बड़ी संख्या है। मेहमानों के लिए पूड़ी, सब्जी और हलवे जैसे पारंपरिक व्यंजनों की व्यवस्था की गई थी। बड़ी संख्या में लोग इस अनोखे आयोजन में शामिल हुए और भोजन ग्रहण किया। हालांकि, इस आयोजन में शामिल लोगों के लिए यह अनुभव बेहद अलग और भावनात्मक था—एक ओर भोज का माहौल था, तो दूसरी ओर यह एहसास भी कि यह किसी जीवित व्यक्ति की तेरहवीं है।

पूरे इलाके में चर्चा का विषय

इस घटना के बाद से यह आयोजन पूरे क्षेत्र में चर्चा का केंद्र बन गया है। लोग इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं—कुछ इसे साहसिक और व्यावहारिक कदम मान रहे हैं, तो कुछ इसे समाज में बढ़ते अकेलेपन और रिश्तों में कम होती संवेदनशीलता का प्रतीक बता रहे हैं।

समाज के लिए एक संदेश

यह घटना कहीं न कहीं समाज को भी सोचने पर मजबूर करती है कि बुजुर्गों की स्थिति और उनके प्रति हमारी जिम्मेदारियां क्या हैं। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतिबिंब है जिसमें इंसान अपने अंतिम समय को लेकर भी असुरक्षित महसूस करता है।

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