UP News: सजा कम कराने की कोशिश नाकाम, राज्यपाल ने क्यों खारिज की अंजनी सिंह की दया याचिका?

गाजीपुर के चर्चित हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे बंदी अंजनी सिंह की समय पूर्व रिहाई की उम्मीदें खत्म हो गई हैं। राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने सुरक्षा कारणों और प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर दया याचिका खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सजा बरकरार रखे जाने और पुलिस के विरोध के बाद यह महत्वपूर्ण फैसला लिया गया है।

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

अप्रैल 21, 2026

UP News: गाजीपुर जिले के मरदह थाना क्षेत्र के निवासी और वाराणसी सेंट्रल जेल में उम्रकैद काट रहे अपराधी अंजनी सिंह की रिहाई की उम्मीदों को करारा झटका लगा है। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने बंदी द्वारा प्रस्तुत की गई क्षमादान याचिका (Mercy Petition) को खारिज कर दिया है। शासन के उपसचिव द्वारा जारी पत्र के अनुसार, स्थानीय प्रशासन की प्रतिकूल रिपोर्ट और अपराध की गंभीरता को देखते हुए यह कड़ा निर्णय लिया गया है।

क्या है पूरा मामला ?

बताते चले कि, इस आपराधिक मामले की जड़ें 29 मई 2006 के उस विवाद से जुड़ी हैं, जहां मामूली कहा-सुनी के बाद अंजनी सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर लालता सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी थी। फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court) ने 2010 में इस जघन्य अपराध के लिए अंजनी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि कानूनी लड़ाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे दोषमुक्त कर दिया था, लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए उसकी सजा को यथावत रखा।

पुलिस की रिपोर्ट ने बढ़ाई बंदी की मुश्किलें

अंजनी सिंह की समय पूर्व रिहाई (Premature Release) के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा जिला मजिस्ट्रेट (DM) और पुलिस अधीक्षक गाजीपुर की संयुक्त रिपोर्ट बनी। पुलिस प्रशासन ने अपनी जांच में स्पष्ट किया कि यदि इस सजायाफ्ता बंदी को समय से पहले रिहा किया जाता है, तो क्षेत्र में दोबारा अपराध पनपने की प्रबल आशंका है। स्थानीय थाने के कड़े विरोध और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन के डर से प्रशासन ने रिहाई के खिलाफ अपनी राय दी थी।

दया याचिका समिति का निर्णय

दया याचिका पर विचार करने वाली विशेषज्ञ समिति ने पाया कि 21 मार्च 2024 तक बंदी ने बिना पैरोल के केवल 12 वर्ष 11 माह की सजा काटी है। समिति का तर्क था कि आजीवन कारावास के मामले में इतनी कम सजा काटकर बाहर आने से समाज में न्याय व्यवस्था के प्रति गलत संदेश जाएगा। समिति की इसी सिफारिश के आधार पर राजभवन ने याचिका को विचार योग्य नहीं माना और उसे निरस्त कर दिया।

राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियां और अनुच्छेद-161 का प्रयोग

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-161 (Article 161 of Constitution) के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए यह आदेश पारित किया। राज्यपाल को यह अधिकार है कि वे किसी अपराधी की सजा को कम या माफ कर सकें, परंतु अंजनी सिंह के मामले में “प्रशासनिक हित” और “सार्वजनिक सुरक्षा” को सर्वोपरि रखा गया। इस आदेश के बाद अब बंदी को अपनी शेष सजा जेल की सलाखों के पीछे ही काटनी होगी।

शासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया

इस पूरे मामले पर जिला प्रोबेशन अधिकारी संजय सोनी ने पुष्टि की है कि शासन से प्राप्त पत्र के आधार पर आवश्यक विभागीय और औपचारिक कार्रवाई (शुरू कर दी गई है। वाराणसी केंद्रीय कारागार को भी इस निर्णय से अवगत करा दिया गया है। प्रशासन के इस रुख से स्पष्ट है कि गंभीर अपराधों में लिप्त बंदियों को रिहाई के लिए कड़ी कानूनी और प्रशासनिक कसौटियों से गुजरना होगा