UP Politics: यूपी चुनाव से पहले मछुआरा वोट पर घमासान, संजय निषाद ने खोला मोर्चा

यूपी विधानसभा चुनाव से पहले संजय निषाद ने मछुआरा समाज की राजनीति को लेकर बड़ा बयान दिया है। निषाद पार्टी अध्यक्ष ने बिना नाम लिए एक राजनीतिक दल और उसके नेताओं पर निशाना साधते हुए ‘मौसमी नेताओं’ से सावधान रहने की अपील की। उन्होंने समाज की एकजुटता, आरक्षण और राजनीतिक पहचान को लेकर भी अपनी बात रखी।

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Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

सितम्बर 14, 2026

UP Politics: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही प्रदेश की सियासत में बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। इसी बीच योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने बिना किसी का नाम लिए एक बड़े राजनीतिक दल और उसके नेताओं पर निशाना साधा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर किए गए पोस्ट में उन्होंने मछुआरा समाज के संघर्ष, राजनीतिक पहचान और समुदाय को बांटने की कथित कोशिशों को लेकर कई सवाल उठाए।

यूपी चुनाव में मछुआरा वोटबैंक को लेकर बढ़ी सियासी हलचल

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संजय निषाद ने अपने पोस्ट में दावा किया कि आजादी के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश में मछुआरा समुदाय राजनीतिक ताकत के तौर पर मजबूती से खड़ा हुआ है। उन्होंने चुनावी मौसम में सामने आने वाले कथित ‘मौसमी नेताओं’ से समाज को सावधान रहने की अपील की। उनके बयान को आगामी विधानसभा चुनाव में मछुआरा समुदाय के बीच राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

मछुआरा वोटों की राजनीति को लेकर संजय निषाद का आरोप

निषाद पार्टी अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दलों और उनके नेता मछुआरा समाज के वोटों को अपने पक्ष में करने की राजनीति करते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि पैसे के जरिए समुदाय को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, संजय निषाद ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में किसी राजनीतिक दल या नेता का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया।

इसके बावजूद उनकी पोस्ट में इस्तेमाल किए गए लाल टोपी और नीली वर्दी जैसे संकेतों को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है। इन संकेतों को समाजवादी पार्टी की ओर इशारा माना जा रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव में सपा को प्रमुख दावेदारों में शामिल माना जा रहा है, ऐसे में संजय निषाद के बयान ने सियासी बहस को और तेज कर दिया है।

‘मछुआरा गरीब भले ही है, लेकिन गद्दार पुत्र नहीं’

संजय निषाद ने अपने पोस्ट में लिखा, “मछुआरा गरीब भले ही हैं लेकिन गद्दार पुत्र नहीं।” इस बयान के जरिए उन्होंने मछुआरा समुदाय की सामाजिक और राजनीतिक पहचान को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मछुआरा समाज का इतिहास संघर्ष और देश के प्रति योगदान से जुड़ा रहा है।उन्होंने दावा किया कि मछुआरा समाज ने अंग्रेजों और मुगलों के खिलाफ संघर्ष किया और देश की आजादी के साथ-साथ संविधान निर्माण में भी अपना योगदान दिया। संजय निषाद ने इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए समाज को अपनी राजनीतिक ताकत और एकजुटता बनाए रखने का संदेश दिया।

मछुआरा समाज में कथित विभाजन को लेकर जताई चिंता

संजय निषाद ने कहा कि मछुआरा समाज के भीतर केवट, मल्लाह, बिंद और कश्यप जैसे विभिन्न वर्गों के बीच भेद पैदा किए जाने से समुदाय को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने समाज के लोगों से आपसी विभाजन से ऊपर उठकर एकजुट होने की अपील की।उन्होंने आरक्षण के मुद्दे को भी अपने बयान में उठाया और इसे मछुआरा समाज के लिए महत्वपूर्ण विषय बताया। उनके मुताबिक राजनीतिक मजबूती के लिए समुदाय का एकजुट रहना जरूरी है। माना जा रहा है कि आगामी चुनाव को देखते हुए निषाद पार्टी इस मुद्दे को अपने राजनीतिक एजेंडे में प्रमुखता से रख सकती है।

गोंडा हत्याकांड के बाद संजय निषाद के तेवरों ने बढ़ाई चर्चा

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संजय निषाद का ताजा बयान ऐसे समय सामने आया है, जब गोंडा में विनोद शहनी की हत्या के मामले को लेकर वह अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए थे। उनके इस कदम ने उस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में काफी चर्चा पैदा की थी। सरकार के सहयोगी दल के प्रमुख नेता का अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया था।

अब मछुआरा समाज और आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर दिए गए उनके बयान ने एक बार फिर सियासी चर्चाओं को हवा दे दी है। उनके ताजा रुख को निषाद समाज के बीच राजनीतिक आधार मजबूत करने और चुनाव से पहले समुदाय को लामबंद करने की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

बिना नाम लिए किस पर साधा निशाना?

संजय निषाद ने भले ही अपने पोस्ट में किसी नेता या राजनीतिक दल का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके संकेतों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लाल टोपी और नीली वर्दी का जिक्र किए जाने के बाद उनके निशाने पर किस दल या नेता को माना जा रहा है, इसे लेकर अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं।

फिलहाल संजय निषाद के बयान ने चुनाव से पहले मछुआरा समाज की राजनीति को केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में इस बयान पर विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं, इस पर भी राजनीतिक नजरें टिकी रहेंगी। यूपी विधानसभा चुनाव से पहले समुदाय आधारित राजनीति और वोटों के समीकरण को लेकर सियासी गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।