UP Election 2027: देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पिच पर आगामी विधानसभा चुनाव का रोमांच अभी से परवान चढ़ने लगा है। 403 विधानसभा सीटों वाले इस राजनीतिक रण में सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए तमाम दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं।उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि,यहां की जनता ने कई बार लहर की राजनीति को प्राथमिकता दी है, तो कई मौकों पर स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय क्षत्रपों ने बाजी पलटी है। राज्य की कुल 403 सीटें विभिन्न अंचलों—पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड, बृज, अवध, पूर्वांचल और बुंदेलखंड में बंटी हुई हैं।
बीजेपी के सामने हैट्रिक की चुनौती, सपा ने भी कसी कमर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 2027 के विधानसभा चुनाव का पारा अभी से चढ़ने लगा है। राज्य की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के सामने जहां अपने विकास कार्यों, कानून-व्यवस्था और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के दम पर लगातार तीसरी बार इतिहास रचने की चुनौती है, वहीं मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (SP) इस बार सत्ता में जोरदार वापसी के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।
2017 में BJP की जीत, 2022 में सपा की वापसी

यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ इटावा जिले की भरथना विधानसभा सीट एक बार फिर सियासी चर्चा के केंद्र में है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित यह सीट पिछले कुछ चुनावों में लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों की गवाह रही है। 2017 में बीजेपी ने यहां पहली बार जीत दर्ज की, जबकि 2022 में समाजवादी पार्टी ने वापसी करते हुए मुकाबला अपने पक्ष में किया। अब 2027 में दोनों प्रमुख दलों के लिए भरथना में अपना आधार मजबूत करने की चुनौती है।
87% ग्रामीण आबादी वाले भरथना में खेती बनेगी बड़ा चुनावी मुद्दा?

बताते चले कि, भरथना इटावा जिले का एक प्रमुख कस्बा और भरथना तहसील का मुख्यालय है। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण यह लंबे समय से आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र की भूमिका निभाता रहा है। विधानसभा क्षेत्र में भरथना नगर पालिका बोर्ड के साथ बकेवर और लखना कस्बा क्षेत्र तथा बड़े ग्रामीण इलाके शामिल हैं। क्षेत्र की करीब 87 प्रतिशत आबादी ग्रामीण मानी जाती है, इसलिए यहां खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था चुनावी मुद्दों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
1957 से शुरू हुआ चुनावी सफर
आपकी जानकारी के लिए बता दे कि, भरथना विधानसभा क्षेत्र का गठन 1957 के चुनाव से पहले हुआ था। शुरुआती दौर में यह सामान्य यानी अनारक्षित सीट थी। 1957 में यहां दो विधायक चुने जाते थे, लेकिन 1962 से यह एक सदस्यीय विधानसभा क्षेत्र बन गया।

अब तक भरथना में 19 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 2001 और 2009 के दो उपचुनाव भी शामिल हैं। चुनावी इतिहास में समाजवादी पार्टी ने इस सीट पर छह बार जीत दर्ज की है। 1957 के दो सदस्यीय चुनाव को अलग-अलग जीतों के रूप में देखें तो कांग्रेस ने चार बार जीत हासिल की। जनता पार्टी को दो बार सफलता मिली, जबकि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, कांग्रेस ओ, लोक दल, जनता दल, बहुजन समाज पार्टी और बीजेपी ने एक-एक बार जीत दर्ज की।
2008 के परिसीमन ने बदल दी सीट की सियासत
भरथना की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव 2008 के परिसीमन के बाद आया। परिसीमन के बाद यह विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गया और इसकी सीमाओं में भी बदलाव किया गया। वर्तमान स्वरूप में विधानसभा क्षेत्र में पूरा चकरनगर तहसील क्षेत्र, भरथना नगर पालिका बोर्ड, बकेवर और लखना कस्बा क्षेत्र तथा भरथना और बकेवर कानूनगो सर्किल शामिल हैं।
आरक्षण के बाद सीट का सामाजिक और राजनीतिक समीकरण भी बदला। इससे पहले सामान्य सीट होने के कारण यादव समेत कई प्रभावशाली सामाजिक समूहों के उम्मीदवार सीधे चुनावी मैदान में उतरते थे। आरक्षित सीट बनने के बाद उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि का दायरा बदल गया।
मुलायम सिंह यादव से जुड़ा है खास चुनावी अध्याय

भरथना के चुनावी इतिहास में 2007 और 2009 का दौर खास रहा। 2007 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने यहां से चुनाव जीता था। बाद में लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद उन्होंने विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया, जिसके चलते 2009 में उपचुनाव हुआ।इस उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने भरथना में अपनी एकमात्र जीत दर्ज की। उस समय सीट सामान्य थी। इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव से आरक्षण व्यवस्था लागू होने के साथ सीट की चुनावी प्रकृति पूरी तरह बदल गई।
2012 में सपा की वापसी
2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की सुखदेवी वर्मा ने जीत दर्ज की। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के राघवेंद्र कुमार को 17,965 वोटों के अंतर से हराया। बीजेपी इस चुनाव में काफी पीछे रही और तीसरे स्थान पर रही। इसके बाद 2017 में बीजेपी ने भरथना में बड़ा उलटफेर किया।
2017 में बीजेपी ने पहली बार खोला खाता

2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने सावित्री कठेरिया को उम्मीदवार बनाया। उन्होंने समाजवादी पार्टी के कमलेश कुमार कठेरिया को 1,968 वोटों के मामूली अंतर से हराया। यह भरथना विधानसभा सीट पर बीजेपी की पहली जीत थी। यानी जिस सीट पर लंबे समय तक समाजवादी पार्टी और दूसरे दलों का प्रभाव रहा, वहां बीजेपी ने पहली बार अपना खाता खोला। हालांकि 2022 में तस्वीर फिर बदल गई।
2022 में सपा की वापसी, मुकाबला रहा करीबी

2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के राघवेंद्र कुमार सिंह ने बीजेपी के सिद्धार्थ शंकर दोहरे को हराया। राघवेंद्र कुमार सिंह को 1,03,676 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार को 96,117 वोट मिले। जीत का अंतर 7,559 वोट रहा। वोट प्रतिशत के लिहाज से भी मुकाबला करीबी रहा। समाजवादी पार्टी ने बीजेपी पर करीब 3.06 प्रतिशत अंक की बढ़त बनाई। यही वजह है कि 2027 के चुनाव में भरथना को ऐसी सीट के तौर पर देखा जा रहा है जहां पिछले दो विधानसभा चुनावों के नतीजे अलग-अलग रहे हैं।
लोकसभा चुनावों में भी बदलता रहा रुझान

भरथना विधानसभा क्षेत्र का रुझान इटावा लोकसभा सीट के चुनावों में भी देखने को मिलता है। 2009 में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी से आगे रहते हुए बहुजन समाज पार्टी पर 8,124 वोटों की बढ़त बनाई थी। 2014 में बीजेपी ने इस पैटर्न को तोड़ा। बीजेपी ने भरथना विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी पर 19,670 वोटों की बढ़त बनाई।
2019 में समाजवादी पार्टी ने फिर वापसी की और बीजेपी पर 13,389 वोटों की बढ़त हासिल की। 2024 में सपा की बढ़त और बढ़ी।
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के जितेंद्र कुमार दोहरे को भरथना विधानसभा क्षेत्र में 1,16,306 वोट मिले, जबकि बीजेपी के राम शंकर कठेरिया को 90,601 वोट मिले। इस तरह सपा को यहां 25,705 वोटों की बढ़त मिली।
मतदाता संख्या में SIR के बाद बड़ा बदलाव

भरथना विधानसभा क्षेत्र में लंबे समय तक मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ती रही। 2012 में यहां 3,65,389 पंजीकृत मतदाता थे। 2017 में यह संख्या बढ़कर 3,90,089 और 2019 में 3,97,783 हो गई। 2022 में मतदाताओं की संख्या 4,09,344 और 2024 में 4,15,332 तक पहुंची। लेकिन 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में यह संख्या घटकर 3,64,862 रह गई। यानी 2024 के आंकड़े की तुलना में 50,470 मतदाताओं की कमी दर्ज हुई, जो करीब 12.15 प्रतिशत है।
हालांकि उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि मतदाता संख्या में इस बदलाव का चुनावी असर किस पार्टी या किस सामाजिक समूह पर कितना पड़ेगा।
मतदान प्रतिशत भी रहा उतार-चढ़ाव वाला

भरथना में मतदान प्रतिशत पिछले चुनावों में अलग-अलग रहा है। 2012 में 57.31 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2017 में यह बढ़कर 59.01 प्रतिशत हो गया।2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत 59.68 रहा, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में यह 60.87 प्रतिशत तक पहुंच गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान घटकर 56.78 प्रतिशत रह गया।
सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण
- भरथना हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है। 2011 की जनगणना के अनुसार भरथना तहसील की आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 4.46 प्रतिशत थी। यह तहसील का आंकड़ा है, इसलिए इसे सीधे विधानसभा क्षेत्र की सटीक धार्मिक जनसंख्या नहीं माना जा सकता।विधानसभा क्षेत्र में अनुसूचित जाति की अनुमानित हिस्सेदारी करीब 30.44 प्रतिशत है।
- सामाजिक संरचना के अनुमानों में यादव आबादी करीब 11.66 प्रतिशत, जाटव 11.11 प्रतिशत, ब्राह्मण 10.27 प्रतिशत, कठेरिया 9.72 प्रतिशत और लोधी 9.72 प्रतिशत बताए जाते हैं। इसके अलावा शाक्य, कुशवाहा, पाल, गड़ेरिया, बघेल, ठाकुर और अन्य समुदाय भी क्षेत्र में मौजूद हैं। खेती और स्थानीय बाजार अर्थव्यवस्था की रीढ़ भरथना का बड़ा हिस्सा ग्रामीण है और यहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है।
- गेहूं, धान, आलू और दूसरी फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। भरथना कस्बा आसपास के गांवों के लिए प्रमुख बाजार और सेवा केंद्र है। बकेवर और लखना भी स्थानीय व्यापारिक गतिविधियों के छोटे केंद्र हैं।
- क्षेत्र को सड़क और रेल कनेक्टिविटी का भी लाभ मिला है। भरथना रेलवे स्टेशन कस्बे में ही स्थित है। इटावा करीब 20 किलोमीटर दूर है, जबकि औरैया करीब 45 किलोमीटर, मैनपुरी करीब 60 किलोमीटर और आगरा करीब 125 किलोमीटर की दूरी पर है।
- आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे और क्षेत्र का सड़क नेटवर्क भरथना को मध्य उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्सों से जोड़ता है। इटावा जिले के कुदरैल से बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे की शुरुआत होने के कारण बुंदेलखंड क्षेत्र की ओर भी संपर्क मजबूत होता है।
इतिहास में भी खास पहचान
भरथना का इतिहास इटावा क्षेत्र की भौगोलिक और प्रशासनिक स्थिति से जुड़ा रहा है। स्थानीय विवरणों में इसके नाम का संबंध भरत सिंह से जोड़ा जाता है और इस बस्ती को भरथनान बीबीपुर के नाम से भी संदर्भित किया गया है।ब्रिटिश काल में केंद्रीय स्थिति के कारण भरथना को प्रशासनिक महत्व मिला। 19वीं शताब्दी के मध्य के आसपास लखना, रमैन और आसपास के पुराने परगनों के कुछ हिस्सों को मिलाकर भरथना परगना बनाया गया।
1857 के विद्रोह के समय तक भरथना इटावा जिले के अंतर्गत एक स्थापित प्रशासनिक इकाई बन चुका था। बाद में रेलवे कनेक्टिविटी ने कस्बे के प्रशासनिक और व्यापारिक महत्व को और बढ़ाया।
2027 में क्या होंगे बड़े फैक्टर?
- यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में भरथना का मुकाबला कई स्तरों पर महत्वपूर्ण होगा। पहला फैक्टर पिछले दो विधानसभा चुनावों का रिकॉर्ड है—2017 में बीजेपी की जीत और 2022 में सपा की वापसी।
- दूसरा फैक्टर 2024 का लोकसभा चुनाव है, जिसमें भरथना विधानसभा क्षेत्र में सपा ने बीजेपी पर 25,705 वोटों की बढ़त बनाई थी।
- तीसरा बड़ा फैक्टर मतदाता सूची में बदलाव है। SIR के बाद मतदाताओं की संख्या में 50 हजार से ज्यादा की कमी हुई है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि इसका राजनीतिक प्रभाव किस दिशा में जाएगा।
- चौथा फैक्टर सीट का सामाजिक समीकरण है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट होने के कारण उम्मीदवार चयन और सामाजिक गठजोड़ का स्वरूप सामान्य सीटों से अलग रहता है।
2027 में भरथना पर किसकी नजर?
2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के सामने 2022 में हासिल सीट को बरकरार रखने की चुनौती होगी, जबकि बीजेपी के लिए 2017 की जीत से बने आधार को फिर मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।

भरथना का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां किसी एक दल की लगातार जीत की गारंटी वाला पैटर्न नहीं रहा है। सपा का लंबे समय का प्रभाव रहा है, लेकिन बीजेपी ने 2017 में पहली विधानसभा जीत हासिल कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। 2022 में सपा ने फिर सीट अपने नाम कर ली और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भरथना विधानसभा क्षेत्र में सपा को स्पष्ट बढ़त मिली।
इसलिए 2027 में भरथना की सियासी कहानी सिर्फ सपा बनाम बीजेपी की सीधी टक्कर तक सीमित नहीं होगी, बल्कि आरक्षित सीट का सामाजिक समीकरण, ग्रामीण मुद्दे, कृषि, स्थानीय विकास, उम्मीदवार चयन, मतदान प्रतिशत और SIR के बाद बदली मतदाता सूची—ये सभी कारक चुनावी तस्वीर को प्रभावित कर सकते हैं।










