UP Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। उन्नाव जिले की भगवंतनगर विधानसभा सीट भी उन सीटों में शामिल है, जहां चुनावी मुकाबला जातीय समीकरण, पुराने राजनीतिक प्रभाव, विकास और प्रत्याशी की लोकप्रियता के इर्द-गिर्द घूमता है। बैसवारा क्षेत्र का हिस्सा मानी जाने वाली इस सीट का अपना ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व रहा है।
भगवंतनगर में जातीय समीकरण कितना अहम?

ऐतिहासिक रूप से भगवंतनगर को क्षत्रिय प्रभाव वाली विधानसभा सीट माना जाता रहा है। हालांकि यहां ब्राह्मण और कुर्मी समाज की भी अच्छी आबादी है। अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक ब्राह्मण करीब 70 हजार, क्षत्रिय 48 हजार, रैदास 44 हजार, रावत 36 हजार, लोधी 36 हजार, कुर्मी 34 हजार, यादव 31 हजार और मुस्लिम मतदाता करीब 23 हजार बताए जाते हैं। ऐसे में 2027 में जातीय समीकरण चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन सकते हैं।
क्षत्रिय-ब्राह्मण-कुर्मी वोट तय करेंगे 2027 का खेल
भगवंतनगर विधानसभा सीट को ऐतिहासिक रूप से क्षत्रिय वर्ग का गढ़ (बैसवारा क्षेत्र) माना जाता है, जहाँ सबसे ज्यादा क्षत्रिय विधायक चुने गए हैं। डौडिया खेड़ा के प्रमुख बैस राजपूत सरदार राम मर्दन सिंह की पत्नी भगवंत कुंवर के नाम पर बसाये गये इस क्षेत्र में क्षत्रिय, ब्राह्मण और कुर्मी तीनों जातियों की आबादी सबसे घनी है और मुख्य मुकाबला इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता है।
भगवंतनगर में विकास की रफ्तार पर सवाल
बैसवारा का गौरवमयी इतिहास संजोए जिले की सबसे बड़ी विधानसभा भगवंतनगर में विकास अपेक्षा के अनुरूप रफ्तार नहीं पकड़ पाया। इस क्षेत्र के आवागमन का मुख्य माध्यम उन्नाव-रायबरेली मार्ग को कई चुनावों में मुद्दा बनाकर प्रत्याशियों ने विधानसभा तक का सफर तय किया। लेकिन इस मार्ग के हालात नहीं बदले।
भगवती सिंह विशारद की जीतों से बदला सियासी इतिहास

रायबरेली और फतेहपुर जिले की सीमाओं से सटी भगवंतनगर विधानसभा क्षेत्र अधिकांश समय कांग्रेस का कब्जा रहा। स्वाधीनता संग्राम सेनानी स्व. भगवती सिंह विशारद यहां से सात बार विधायक रहे। आजादी के बाद 1952 और 1962 में कांग्रेस के देवदत्त मिश्रा ने विधानसभा में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 1957 में पहली बार प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव जीतने वाले भगवती सिंह विशारद ने 1969 में कांग्रेस का दामन थामा और चुनाव में जीत दर्ज की। इसके बाद वह 1974, 1980, 1985, 1991 में भी जीते। 1970, 1989 और 1993 में जनता पार्टी के चौधरी देवकी नंदन पर जनता ने अपना विधायक चुना।
चौधरी देवकीनंदन के निधन से रिक्त हुई सीट के उपचुनाव में सपा के डा. शिव सागर लाल वर्मा ने क्षेत्र का नेतृत्व किया।।1996 में भाजपा से कृपा शंकर सिंह निर्वाचित हुए जो पुनरू बसपा से 2007 में चुने गए, 2002 में बसपा से नत्थू सिंह विजयी रहे और 2012 में क्षेत्र के लोगों ने सपा के कुलदीप सिंह सेंगर को विधायक चुना। इसके बाद हुए 2017 के चुनाव में भाजपा के ह्रदयनारायण दीक्षित को जनता ने विधानसभा भेजा। वर्ष 2022 में भाजपा के आशुतोष शुक्ला ने जीत का परचम लहराया।
विधानसभा क्षेत्र की खासियत
सिद्धपीठ चंद्रिका देवी बक्सर धाम, राजा रावराम बक्श सिंह स्मारक डौंडिया खेड़ा, पाटन का तकिया मेला, साहित्यकार पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, शिवमंगल सिंह सुमन, बैजेगांव बेथर के हिंदी के पुरोधा पं. प्रताप नारायण मिश्र, कवि पं. गया प्रसाद शुक्ल सनेही, हास्य कवि काका बैसवारी, मगरायार के बलई काका, अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद का गांव बदरका, मानपुर में राजकीय पालीटेक्निक।
भगवंतनगर विधानसभा क्षेत्र का ब्योरा
- कुल मतदाता- 406823
- पुरुष- 220490
- महिला-186328
- अन्य 05
- साक्षरता दर-79 फीसदी
- अब तक के विधायक
- 1957 भगवती सिंह प्रजातांत्रिक सोशलिस्ट पार्टी
- 1962 देवदत्त कांग्रेस
- 1967 भगवती सिंह प्रजातांत्रिक सोशलिस्ट पार्टी
- 1969 भगवती सिंह कांग्रेस
- 1974 भगवती सिंह कांग्रेस
- 1977 देवकी नंदन जनता पार्टी
- 1980 भगवती सिंह कांग्रेस
- 1985 भगवती सिंह कांग्रेस
- 1989 देवकी नंदन भाजपा
- 1991 भगवती सिंह काग्रेस
- 1993 देवकी नंदन भाजपा
- 1996 कृपाशंकर सिंह भाजपा
- 2002 नत्थू सिंह बसपा
- 2007 कृपाशंकर सिंह बसपा
- 2012 कुलदीप सेंगर सपा
- 2017 ह्रदयनारायण दीक्षित भाजपा
- 2022 आशुतोष शुक्ला भाजपा
जातीय समीकरण (अनुमानित)
- ब्राह्मण-70 हजार
- क्षत्रिय-48 हजार
- रैदास-44 हजार
- रावत-36 हजार
- कुर्मी- 34 हजार
- यादव- 31 हजार
- लोधी- 36 हजार
- मुस्लिम-23 हजार
इस विधानसभा क्षेत्र का 91 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र का होने के कारण यहा मुख्य व्यवसाय कृषि है। 2014 के बाद हुए पांच प्रमुख चुनावों में भाजपा या तो जीत हासिल करती रही या सबसे आगे रहीं। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने भाजपा को कड़ी चुनौती दी। इस चुनाव में भगवंतनगर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की बढ़त केवल 1.6 प्रतिशत अधिक थी। इस बदलाव ने भाजपा के लिए क्षेत्र के मतदाताओं के रूझान को लेकर सवाल खडे किए है। जबकि समाजवादी पार्टी के लिए यह परिणाम उम्मीद पैदा करने वाला है। बेहतर प्रत्याशी और चुनाव प्रबंधन से 2027 कि विधानसभा चुनाव में सपा बड़ी चुनौती पेश कर सकती है।











