UNSC Membership: UNSC सीट पर भारत की नजर, विदेश मंत्री जयशंकर ने संभाला मोर्चा

UNSC की 2028-29 की अस्थायी सदस्यता के लिए जून 2027 में चुनाव होंगे। एशिया-प्रशांत समूह की एक सीट पर भारत और ताजिकिस्तान आमने-सामने होंगे।

UNSC Membership

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

जुलाई 14, 2026

UNSC Membership: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अपनी स्थिति को और मजबूत करने के लिए भारत ने एक बार फिर कमर कस ली है। वर्ष 2028-2029 की अवधि के लिए सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता हासिल करने के इरादे से भारत ने अपना आधिकारिक प्रचार अभियान तेज कर दिया है। न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक विशेष और गरिमापूर्ण कार्यक्रम के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ‘शांति: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद 2028-29 के लिए भारत-मानदंड, विश्वास और निष्ठा’ नामक अभियान की औपचारिक शुरुआत की। इस वैश्विक मंच पर आयोजित कार्यक्रम में दुनिया भर के कई देशों के स्थायी प्रतिनिधि, शीर्ष राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे, जिनके समक्ष भारत ने अपनी उम्मीदवारी और वैश्विक प्राथमिकताओं को मजबूती से पेश किया।

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एशिया-प्रशांत समूह की सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान में आमने-सामने की जंग

सुरक्षा परिषद की इस अस्थायी सदस्यता के लिए अगले साल जून में मतदान होना तय हुआ है। इस बार एशिया-प्रशांत समूह के लिए आरक्षित एकमात्र सीट पर भारत का सीधा मुकाबला ताजिकिस्तान से होने जा रहा है। भारत इससे पहले वर्ष 2021-22 की अवधि के लिए भी सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है, जहां उसने वैश्विक स्तर पर आतंकवाद और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अग्रणी भूमिका निभाई थी।

अपनी इस दावेदारी को और मजबूत करने के लिए विदेश मंत्री एस जयशंकर लगातार द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मोर्चों पर सक्रिय हैं। कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान जैसे खाड़ी देशों की सफल यात्रा पूरी करने के बाद वे सीधे न्यूयॉर्क पहुंचे हैं। यहाँ संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से मुलाकात के साथ-साथ वे लगातार विभिन्न देशों का समर्थन हासिल करने के प्रयास में जुटे हैं। इसके बाद वे ब्रुसेल्स में भारत-यूरोपीय संघ व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद की बैठक में भी हिस्सा लेंगे।

वैश्विक उथल-पुथल के बीच UNSC में सुधारों की उठती मांग

यह चुनाव एक ऐसे दौर में होने जा रहा है जब पूरी दुनिया अत्यंत नाजुक और तेजी से बदलते भू-राजनीतिक (Geo-political) संकटों से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा का भीषण संघर्ष और पश्चिमी एशिया में ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल की सैन्य तनातनी ने वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। इन गंभीर परिस्थितियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल ही में वैश्विक स्तर पर विकासशील देशों की समान भागीदारी की वकालत की है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाओं में सुधार अब समय की सबसे बड़ी मांग बन चुका है।

सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार है भारत

भारत केवल अस्थायी सदस्यता तक ही सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बुनियादी और व्यापक ढांचागत सुधारों का सबसे बड़ा पैरोकार रहा है। भारत का हमेशा से यह रुख रहा है कि वर्ष 1945 के वैश्विक समीकरणों के आधार पर गठित यह 15 सदस्यीय परिषद अब 21वीं सदी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं और विकासशील देशों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती है।

भारत का मानना है कि वैश्विक शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी, दोनों ही श्रेणियों में नए देशों को शामिल कर इसका विस्तार किया जाना चाहिए। अपनी विशाल आबादी, मजबूत अर्थव्यवस्था और वैश्विक शांति अभियानों में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक होने के नाते भारत स्वयं को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का सबसे योग्य और वैध हकदार मानता है।

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