UK Slavery Apology : ब्रिटेन की गुलामी पर ऐतिहासिक माफी का ऐलान, भारत समेत 56 देशों से मांगेगा माफी

सदियों पहले गुलामी के कारोबार में ब्रिटेन की भूमिका पर अब नई बहस छिड़ गई है। प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम औपचारिक माफी की मांगों पर बातचीत को तैयार हैं, लेकिन आर्थिक मुआवजे से इनकार कर चुके हैं। भारत समेत 56 राष्ट्रमंडल देशों की नजरें अब सम्मेलन के फैसलों पर टिकी हैं।

UK Slavery Apology

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

नवम्बर 1, 2026

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UK Slavery Apology :  ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने देश के औपनिवेशिक इतिहास को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि ब्रिटेन की सरकार ऐतिहासिक दास व्यापार यानी स्लेव ट्रेड में अपनी भूमिका के लिए माफी मांगने को तैयार है। इस माफी के दायरे में भारत समेत उन 56 देशों को शामिल किया जा सकता है, जो ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान गुलामी और शोषण से प्रभावित हुए थे। हालांकि, प्रधानमंत्री ने आर्थिक मुआवजा देने की संभावना से साफ इनकार किया है। शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को द गार्जियन में प्रकाशित अपने लेख में बर्नहम ने यह बात कही। उनके इस बयान को ब्रिटेन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कॉमनवेल्थ बैठक से पहले क्यों आया माफी का बयान?

प्रधानमंत्री का यह बयान अगले सप्ताह एंटीगुआ और बारबुडा में आयोजित होने वाली कॉमनवेल्थ हेड्स ऑफ गवर्नमेंट मीटिंग (CHOGM) से पहले सामने आया है। लंबे समय से कई देश और संगठन ब्रिटेन से गुलामी तथा औपनिवेशिक शोषण के लिए औपचारिक माफी और मुआवजे की मांग करते रहे हैं। भारत सहित 56 देशों का मामला भी इसी ऐतिहासिक बहस से जुड़ा है। ऐसे समय में बर्नहम की ओर से माफी की इच्छा जताना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि, आर्थिक मुआवजे से इनकार किए जाने के कारण इस घोषणा को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।

ब्रिटेन ने लाखों अफ्रीकी लोगों को बनाया था गुलाम

इतिहास के मुताबिक, ब्रिटेन ने अटलांटिक दास व्यापार के दौरान लगभग 30 लाख अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर अमेरिका स्थित अपने उपनिवेशों में भेजा था। वहां इन लोगों से बागानों और दूसरे कामों में जबरन मजदूरी कराई जाती थी। ब्रिटेन ने 1807 में अपने साम्राज्य में दास व्यापार को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद 1833 में गुलामी खत्म करने का कानून पारित किया गया, लेकिन सभी गुलामों को तत्काल आजादी नहीं मिली। कई लोगों को 1838 तक स्वतंत्रता का इंतजार करना पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि 1833 में ब्रिटिश सरकार ने गुलामों के मालिकों को 2 करोड़ पाउंड का मुआवजा दिया था। यह रकम उस समय ब्रिटेन के वार्षिक सरकारी बजट का लगभग 40 प्रतिशत थी।

भारत से 20 लाख लोगों को भेजा गया था ब्रिटिश उपनिवेशों में

गुलामी समाप्त होने के बाद भी ब्रिटिश साम्राज्य में भारतीय मजदूरों का शोषण पूरी तरह बंद नहीं हुआ। 1838 से 1917 के बीच अनुबंधित श्रम यानी इंडेंचर्ड लेबर की व्यवस्था के तहत भारत से लगभग 20 लाख पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को विभिन्न ब्रिटिश उपनिवेशों में भेजा गया। इन मजदूरों को कैरेबियन देशों से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक के बागानों में काम करना पड़ा। कई मजदूरों को बेहतर रोजगार का लालच देकर ले जाया गया, जबकि उन्हें वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी नहीं दी गई थी। कुछ मामलों में अपहरण और मानव तस्करी जैसी घटनाएं भी सामने आईं। कठिन परिस्थितियों और आर्थिक मजबूरियों के कारण बड़ी संख्या में मजदूर भारत वापस नहीं लौट सके।

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शशि थरूर ने माफी के फैसले का किया स्वागत

ब्रिटिश प्रधानमंत्री के बयान पर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन चाहे जितना भी आर्थिक हर्जाना देने की पेशकश करे, कोई भी रकम ऐतिहासिक नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त या स्वीकार्य नहीं हो सकती। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उपनिवेशवाद से हुई तबाही के लिए नैतिक प्रायश्चित बेहद जरूरी है। थरूर ने गुलामी के इतिहास पर औपचारिक माफी मांगने की बर्नहम की इच्छा का स्वागत किया, लेकिन साथ ही सवाल उठाया कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने व्यापक औपनिवेशिक शासन और उसके अत्याचारों के लिए माफी की बात क्यों नहीं की।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ब्रिटेन का यह फैसला?

भारत उन देशों में शामिल है, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान लंबे समय तक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शोषण का सामना किया। ऐसे में ब्रिटेन की प्रस्तावित माफी ऐतिहासिक जिम्मेदारी और औपनिवेशिक विरासत पर नई बहस छेड़ सकती है। हालांकि, माफी और आर्थिक मुआवजे के बीच अंतर को लेकर प्रभावित देशों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। अब सबकी नजर कॉमनवेल्थ बैठक पर है, जहां यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठ सकता है।

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