ट्रंप की 6 अप्रैल तक की मोहलत: ईरान के लिए नहीं, खुद के लिए थी ये समयसीमा

न्यूयॉर्क  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सरेंडर करने के लिए उसे छह अप्रैल तक की मोहलत दी थी. लेकिन, अब साफ हो चुका है कि यह मोहलत ईरान के लिए नहीं, बल्कि खुद डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य और राजनीतिक मजबूरी के लिए थी. 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान युद्ध में अमेरिका ने भारी सैन्य तैयारी की, बड़े-बड़े नौसैनिक बेड़े भेजे और नाटो देशों से साथ आने की अपील की, लेकिन होर्मुज की खाड़ी में ईरान की पकड़ इतनी मजबूत साबित हुई कि ट्रंप की सारी रणनीति हांफती नजर आ रही है. अब ट्रंप नाटो सहयोगियों को गरियाने

Wrriten By :

Editor

Published On :

अप्रैल 5, 2026

Advertisements
728x90 Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital.jpg

न्यूयॉर्क

 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सरेंडर करने के लिए उसे छह अप्रैल तक की मोहलत दी थी. लेकिन, अब साफ हो चुका है कि यह मोहलत ईरान के लिए नहीं, बल्कि खुद डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य और राजनीतिक मजबूरी के लिए थी. 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान युद्ध में अमेरिका ने भारी सैन्य तैयारी की, बड़े-बड़े नौसैनिक बेड़े भेजे और नाटो देशों से साथ आने की अपील की, लेकिन होर्मुज की खाड़ी में ईरान की पकड़ इतनी मजबूत साबित हुई कि ट्रंप की सारी रणनीति हांफती नजर आ रही है. अब ट्रंप नाटो सहयोगियों को गरियाने लगे हैं और ईरान के जवाबी हमलों में अमेरिकी फाइटर जेट व हेलीकॉप्टर मारे जा रहे हैं। 

ट्रंप प्रशासन ने शुरू से ही ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई. इजराइल के साथ मिलकर शुरू किए गए हमलों में अमेरिका ने ईरान के नेतृत्व, परमाणु सुविधाओं और मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाया. ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की नौसेना और वायु सेना तबाह हो चुकी है. लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया. इस समुद्री रास्ते से दुनिया के 20 प्रतिशत तेल की ढुलाई होती है. इस रास्ते के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया है और तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। 

पहले 48 घंटे का दिया था अल्टीमेटम
ट्रंप ने शुरू में ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया कि होर्मुज खोलो वरना पावर प्लांट तबाह कर देंगे. फिर इसे बढ़ाकर छह अप्रैल कर दी. जानकारों के अनुसार यह विस्तार इसलिए किया गया क्योंकि अमेरिका को अपनी सैन्य तैयारी मजबूत करने का समय चाहिए था. इस दौरान अमेरिका ने फारस की खाडी में बड़े नौसैनिक फ्लीट भेजे, जिनमें सुपर कैरियर जैसे USS जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश भी शामिल हैं. साथ ही ट्रंप ने नाटो देशों से अपील की कि वे भी नौसेना भेजकर होर्मुज को खोलने में मदद करें। 

लेकिन नाटो सहयोगी इस अपील पर खरे नहीं उतरे. यूरोपीय देशों ने साफ कहा कि वे अमेरिका-इजराइल युद्ध में सीधे शामिल नहीं होंगे. ट्रंप ने गुस्से में नाटो को कागजी शेर करार दिया और यहां तक कह दिया कि अमेरिका नाटो से बाहर निकलने पर विचार कर रहा है. उन्होंने कहा कि जब अमेरिका को जरूरत पड़ी तो सहयोगी पीछे हट गए, जबकि अमेरिका सालों से उनका बचाव करता रहा. नाटो महासचिव मार्क रुट्टे ने कुछ समर्थन जताया, लेकिन ज्यादातर यूरोपीय नेता ट्रंप की मांगों से दूर रहे. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने तो ट्रंप की रणनीति को अस्थिर बताया. होर्मुज में अमेरिका की स्थिति कमजोर साबित हुई. ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता के सामने अमेरिकी नौसेना भी पूरी तरह ईरान को हिला नहीं पाई. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मजबूत नियंत्रण बनाए रखा और कुछ जहाजों को ही गुजरने दिया, जो ज्यादातर ईरान से जुड़े थे. इसमें कुछ भारत और चीन के जहाज थे। 

अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बनी
विश्लेषकों का कहना है कि होर्मुज में ईरान की भौगोलिक स्थिति और एंटी-शिप मिसाइलें अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. अब युद्ध के करीब पांच हफ्ते बाद अमेरिका को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है. एक दिन पहले ही ईरान ने अमेरिकी F-15E फाइटर जेट को मार गिराया. उस जेट का पायलट लापता है. संभवतः वह ईरान के कब्जे में है. सर्च एंड रेस्क्यू के दौरान दो ब्लैकहॉक हेलीकॉप्टर भी ईरानी गोलीबारी के शिकार हुए, हालांकि वे सुरक्षित लैंड कर गए. एक अन्य A-10 वारथोग विमान को भी कुवैत के ऊपर मार गिराया गया. ये घटनाएं अमेरिकी एयर पावर के दावों पर सवाल खड़े करती हैं. ईरान के आईआरजीसी ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है। 

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि युद्ध समाप्ति की ओर है और अगले 2-3 हफ्तों में अमेरिका बहुत जोरदार हमले करेगा. उन्होंने दावा किया कि ईरान की नौसेना चली गई है, एयर फोर्स तबाह हो चुकी है और मिसाइल स्टॉक खत्म हो रहा है. लेकिन जमीनी हकीकत अलग है. ईरान ने जवाबी हमलों में इजराइल और गल्फ देशों पर सैकड़ों मिसाइलें दागीं और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया. कुछ रिपोर्ट्स में अमेरिकी नौसैनिक अड्डों पर हमलों की भी बात कही गई। 

यह युद्ध ट्रंप के लिए राजनीतिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर चुनौती बन गया है. ईरान ने अमेरिका की कमजोर नस पकड़ ली है. होर्मुज की बंदी और उसके सटीक जवाबी हमले ने डोनाल्ड ट्रंप को बैकफुट पर ला दिया है. अब ट्रंप खुद को बचाने की कोशिश में लगे हैं. अगर छह अप्रैल तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई तो पावर प्लांट पर हमले की धमकी फिर दोहराई जा सकती है, लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा करना और बड़ा संकट पैदा कर सकता है. कुल मिलाकर ट्रंप की मोहलत खुद उनकी हांफती रणनीति का प्रतीक बन गई है. ईरान ने दिखा दिया कि वह आसानी से दबने वाला नहीं है। 

Leave a Comment

2