
Trump Russia Oil Deal : रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर सख्ती की बात करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद रूस के साथ तेल समझौते को लेकर चर्चा में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन भारत और चीन समेत कुछ देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की संभावना जता चुका है। इसका उद्देश्य रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली कमाई पर दबाव बनाना बताया गया है। हालांकि, रूस से ईंधन आपूर्ति के अपने फैसले का ट्रंप ने बचाव किया है और इसे अमेरिकी हितों के अनुरूप बताया है।
ट्रुथ सोशल पर मीडिया को ट्रंप का जवाब
अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने मीडिया पर निशाना साधते हुए उसे पक्षपाती बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि समाचार माध्यम यूरोपीय संघ की ओर से पहले रूस को ऊर्जा खरीद के लिए किए गए भुगतान की चर्चा नहीं करते। ट्रंप के अनुसार, यूरोपीय संघ ने रूस को ऊर्जा के लिए 250 अरब डॉलर दिए थे। उन्होंने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि उनका फैसला अमेरिकी जनता के हित में है। ट्रंप ने अपनी नीति को ‘अमेरिका फर्स्ट’ यानी अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देने की रणनीति से जोड़कर पेश किया।
रूस से डीजल आपूर्ति को लेकर क्या है दावा?
रिपोर्ट में शुक्रवार को ट्रंप के हवाले से बताया गया कि रूस अमेरिका समेत वैश्विक बाजार में तीन लाख मीट्रिक टन से अधिक डीजल उपलब्ध कराएगा। इसके अलावा, नवंबर में पांच लाख मीट्रिक टन और आगे चलकर दस लाख मीट्रिक टन डीजल की आपूर्ति का भी उल्लेख किया गया। इस कथित समझौते का पूरा विवरण और आपूर्ति की शर्तें स्वतंत्र रूप से स्पष्ट होना जरूरी है। ऊर्जा बाजार में कीमतों और उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता के बीच इस तरह की आपूर्ति का दावा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अमेरिकी चुनाव से पहले महंगाई बनी चुनौती
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव से पहले ईंधन की बढ़ती कीमतें और जीवनयापन का खर्च राजनीतिक मुद्दा बने हुए हैं। महंगे पेट्रोलियम उत्पादों का असर परिवहन, वस्तुओं की ढुलाई और आम परिवारों के बजट पर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, इन परिस्थितियों के बीच ट्रंप प्रशासन के रूस के साथ तेल समझौते को लेकर सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऊर्जा की कीमतों पर नियंत्रण और घरेलू आर्थिक दबाव चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, इस समझौते के पीछे चुनावी कारण होने का दावा एक विश्लेषण है, स्थापित तथ्य नहीं।
छह अमेरिकी सीनेटरों ने समझौते पर जताई आपत्ति
रिपोर्ट के मुताबिक, छह अमेरिकी सीनेटरों, जिनमें चार रिपब्लिकन सदस्य भी शामिल हैं, ने ट्रंप प्रशासन से रूस के साथ इस समझौते से पीछे हटने की अपील की है। उनका तर्क है कि यूक्रेन में युद्ध और आम नागरिकों की मौतों के बीच रूस को आर्थिक लाभ पहुंचाना उचित नहीं होगा। इन सांसदों की चिंता है कि ऊर्जा खरीद से मिलने वाला राजस्व रूस की आर्थिक स्थिति को सहारा दे सकता है। इस विरोध के बाद समझौते को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।

भारत और चीन पर टैरिफ नीति का क्या होगा असर?
रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी का असर भारत और चीन जैसे बड़े आयातकों के व्यापारिक संबंधों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, रूस से ईंधन आपूर्ति लेने के अमेरिकी फैसले को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाशिंगटन की नीति सभी देशों पर समान रूप से लागू होगी। फिलहाल, टैरिफ प्रस्ताव और तेल आपूर्ति से जुड़े दावों की आधिकारिक शर्तों की पुष्टि जरूरी है। यह विवाद ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और यूक्रेन युद्ध से जुड़ी अमेरिकी नीति के बीच जटिल संतुलन को उजागर करता है।
Read More : UPI Payment Rule: 15 अक्टूबर से बदलने वाला था नियम, अब दिवाली तक राहत











