Trump Greenland Deal: अमेरिकी राजनीति में एक बार फिर ‘ग्रीनलैंड’ को लेकर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कड़े तेवरों के बीच अब उनकी इस योजना को कानूनी जामा पहनाने की कवायद शुरू हो गई है। रिपब्लिकन पार्टी के सांसद रैंडी फाइन ने औपचारिक रूप से ‘ग्रीनलैंड एनेक्सेशन एंड स्टेटहुड एक्ट’ (Greenland Annexation and Statehood Act) पेश किया है। इस विवादित बिल का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी सरकार को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने और भविष्य में उसे अमेरिका के एक नए राज्य के रूप में शामिल करने के लिए कानूनी शक्ति प्रदान करना है। इस कदम ने न केवल यूरोप, बल्कि पूरी दुनिया के कूटनीतिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है।
सांसद रैंडी फाइन का दावा: आर्कटिक में संप्रभुता की रक्षा
रिपब्लिकन सांसद रैंडी फाइन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर गर्व के साथ इस बिल की घोषणा की। उन्होंने तर्क दिया कि यह कानून राष्ट्रपति को ग्रीनलैंड को अमेरिकी संघ का हिस्सा बनाने के लिए आवश्यक संसाधन और अधिकार देगा। फाइन का कहना है कि वर्तमान में अमेरिका के विरोधी देश आर्कटिक क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं, जिसे रोकना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रंप और विदेश मंत्री मार्को रुबियो का दृष्टिकोण ‘अमेरिकी प्रभुत्व’ को बहाल करना है, और यह बिल उस सपने को हकीकत में बदलने की दिशा में पहला ठोस कदम है।
चीन और रूस को चुनौती: रणनीतिक ‘ऊंची जमीन’ की तलाश
इस विधायी पहल के पीछे सबसे बड़ा कारण चीन और रूस की आर्कटिक में बढ़ती सक्रियता को माना जा रहा है। रैंडी फाइन के मुताबिक, ग्रीनलैंड का अधिग्रहण अमेरिका को अगली सदी के लिए एक मजबूत ‘रणनीतिक जमीन’ प्रदान करेगा। अमेरिका का मानना है कि यदि वह ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं करता है, तो दुश्मन देश यहाँ पैर जमा लेंगे, जिससे अमेरिकी संप्रभुता के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। यह नया कानून अमेरिका को ग्रीनलैंड के अधिग्रहण के लिए “जो भी आवश्यक कदम हों” उठाने की अनुमति देता है, जिसमें सैन्य और कूटनीतिक दोनों रास्ते शामिल हो सकते हैं।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड का रुख: “हम बिकाऊ नहीं हैं”
भले ही अमेरिका अधिग्रहण की तैयारी कर रहा हो, लेकिन धरातल पर स्थिति काफी अलग है। ग्रीनलैंड वर्तमान में डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त हिस्सा है। यहाँ 1979 से ही व्यापक स्वशासन लागू है, हालांकि रक्षा और विदेश नीति के फैसले डेनमार्क द्वारा लिए जाते हैं। डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों ने बार-बार कड़े शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड कोई व्यावसायिक संपत्ति नहीं है जिसे खरीदा या बेचा जा सके। उन्होंने ट्रंप की इस पेशकश को हास्यास्पद और संप्रभुता का अपमान बताया है। बावजूद इसके, ट्रंप प्रशासन इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा मानकर पीछे हटने को तैयार नहीं है।
व्हाइट हाउस का रुख: प्रतिद्वंद्वी शक्तियों पर अंकुश
व्हाइट हाउस ने भी इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट की है। प्रशासन का मानना है कि वैश्विक शक्तियों के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा में ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। ट्रंप का तर्क है कि यदि अमेरिका ने इस द्वीप का अधिग्रहण नहीं किया, तो यह धीरे-धीरे चीन या रूस जैसे देशों के प्रभाव में चला जाएगा। इस कानून के माध्यम से अमेरिका आधिकारिक तौर पर डेनमार्क पर दबाव बनाने और संभवतः ‘जबरदस्ती’ अधिग्रहण की राह खोलने की कोशिश कर रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों के बीच तनाव का एक बड़ा कारण बन सकता है।
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