Trump’s Board of Peace: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई कूटनीतिक पहल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है। वैश्विक शांति और सुरक्षा के उद्देश्य से गठित किए गए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) में शामिल होने के अमेरिकी प्रस्ताव को न्यूजीलैंड ने आधिकारिक तौर पर खारिज कर दिया है। न्यूजीलैंड के इस कड़े रुख ने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल तेज कर दी है, क्योंकि इसे अमेरिका के एक प्रमुख सहयोगी देश द्वारा ट्रंप की विदेश नीति से दूरी बनाने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन का स्पष्ट इनकार: कूटनीतिक तालमेल की कमी
न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने एक आधिकारिक बयान जारी कर ट्रंप के शांति बोर्ड का हिस्सा बनने से साफ मना कर दिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा भेजे गए एक ईमेल में स्पष्ट किया गया कि वर्तमान परिस्थितियों में इस बोर्ड के साथ जुड़ना न्यूजीलैंड के लिए कूटनीतिक रूप से सही नहीं है। लक्सन का मानना है कि बोर्ड ऑफ पीस का मौजूदा ढांचा और उसके रणनीतिक उद्देश्य न्यूजीलैंड की स्वतंत्र विदेश नीति के सिद्धांतों के साथ मेल नहीं खाते हैं। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यूजीलैंड पारंपरिक रूप से अमेरिका का करीबी रक्षा और व्यापारिक साझेदार रहा है।
क्या है ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’? गाजा संकट के समाधान की पहल
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले सप्ताह गाजा में चल रहे तनाव को कम करने और वहां एक स्थायी युद्धविराम स्थापित करने के उद्देश्य से इस उच्च-स्तरीय बोर्ड का गठन किया था। ट्रंप की योजना इस मंच को केवल गाजा तक सीमित रखने की नहीं है, बल्कि वे इसे एक ऐसे वैश्विक निकाय के रूप में विकसित करना चाहते हैं जो भविष्य में दुनिया के अन्य विवादित क्षेत्रों में भी मध्यस्थता कर सके। इसी विजन को विस्तार देने के लिए उन्होंने दुनिया के प्रभावशाली देशों को इस शांति मंच से जुड़ने का न्योता भेजा था।
संयुक्त राष्ट्र बनाम शांति बोर्ड: विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स का तर्क
न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने इस अस्वीकृति के पीछे के तकनीकी और सैद्धांतिक कारणों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यूजीलैंड संयुक्त राष्ट्र (UN) का संस्थापक सदस्य है और वह अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए हमेशा ‘संयुक्त राष्ट्र चार्टर’ की सर्वोच्चता का समर्थन करता है। पीटर्स के अनुसार, गाजा जैसे संवेदनशील मामलों में न्यूजीलैंड इस नए बोर्ड के माध्यम से कोई अतिरिक्त या विशेष योगदान देने की स्थिति में नहीं है। उनका तर्क है कि कोई भी नया अंतरराष्ट्रीय मंच संयुक्त राष्ट्र के समानांतर खड़ा होने के बजाय उसके सहायक के रूप में काम करना चाहिए।
पश्चिमी देशों की बेरुखी: केवल मुस्लिम देशों का मिल रहा समर्थन
ट्रंप की इस पहल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरा विभाजन देखने को मिल रहा है। जहाँ एक ओर तुर्की, मिस्र, सऊदी अरब, कतर और इंडोनेशिया जैसे प्रमुख मुस्लिम देशों ने इस बोर्ड का हिस्सा बनने पर सहमति जताई है, वहीं अमेरिका के पारंपरिक पश्चिमी मित्र देशों ने इससे दूरी बनाए रखी है। न्यूजीलैंड के अलावा फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन और डेनमार्क जैसे यूरोपीय देशों ने भी ट्रंप के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। पश्चिमी शक्तियों की यह बेरुखी ट्रंप की इस नई शांति पहल की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है।
कार्यप्रणाली पर स्पष्टता का अभाव: विशेषज्ञों की राय
विदेशी मामलों के जानकारों का मानना है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के कार्यक्षेत्र और इसकी जवाबदेही को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अभी भी भारी संशय है। विकसित देशों के पीछे हटने की एक मुख्य वजह यह भी है कि इस निकाय के कामकाज का तरीका और इसकी स्वायत्तता पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। जब तक इस बोर्ड की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता और इसके संचालन की रूपरेखा साफ नहीं हो जाती, तब तक अन्य लोकतांत्रिक देशों के इसमें शामिल होने की संभावना कम ही नजर आती है।









