Trump Tariff Threat: डोनाल्ड ट्रंप की 100% टैरिफ धमकी से भारतीय फार्मा सेक्टर में कोहराम, सन फार्मा और सिप्ला के शेयर औंधे मुंह गिरे!

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने उन दवा कंपनियों पर 100% टैरिफ लगाने की तैयारी कर ली है जिन्होंने अमेरिका के साथ 'प्राइसिंग डील' साइन नहीं की है। इस खबर के आते ही भारतीय फार्मा दिग्गजों के शेयर 6% तक गिर गए। क्या यह भारतीय दवा उद्योग के अंत की शुरुआत है या ट्रंप की सिर्फ एक नई सौदेबाजी?

Trump Tariff Threat

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 2, 2026

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Trump Tariff Threat:  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया बयान ने भारतीय दवा उद्योग की नींद उड़ा दी है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिका में आयात होने वाली विदेशी दवाओं पर 100% तक का भारी-भरकम टैरिफ (आयात शुल्क) लगाया जा सकता है। इस घोषणा का सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर पड़ा, जहां फार्मा सेक्टर के प्रति निवेशकों का भरोसा डगमगा गया। बाजार के जानकारों का मानना है कि यह कदम वैश्विक व्यापार युद्ध की नई शुरुआत हो सकता है, जिससे भारत जैसे प्रमुख निर्यातक देशों की मुश्किलें बढ़ना तय है।

शेयर बाजार का हाल: दिग्गज फार्मा कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026 को बाजार खुलते ही फार्मा सेक्टर में बिकवाली का दौर शुरू हो गया। निफ्टी फार्मा इंडेक्स (Nifty Pharma Index) लगभग 2.5% तक नीचे गिर गया। सबसे बुरा असर देश की सबसे बड़ी दवा कंपनी सन फार्मा पर पड़ा, जिसके शेयर 4-5% तक टूट गए। इसके साथ ही डॉ. रेड्डीज, सिपला, ल्यूपिन, बायोकॉन और ज़ायडस लाइफसाइंसेज जैसी नामचीन कंपनियों के शेयरों में भी 2% से 5% की गिरावट देखी गई। निवेशकों को डर है कि यदि यह टैरिफ लागू होता है, तो कंपनियों के मुनाफे पर सीधा प्रहार होगा।

ट्रंप की ‘मेड इन अमेरिका’ नीति और घरेलू विनिर्माण पर जोर

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप का यह कदम उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ और ‘मेड इन अमेरिका’ नीति का हिस्सा है। उनका मुख्य उद्देश्य अमेरिकी धरती पर रोजगार के अवसर पैदा करना और घरेलू विनिर्माण (Manufacturing) को बढ़ावा देना है। ट्रंप का तर्क है कि यदि विदेशी कंपनियां अमेरिकी बाजार का लाभ उठाना चाहती हैं, तो उन्हें अपने कारखाने अमेरिका में ही लगाने होंगे। जो कंपनियां ऐसा नहीं करेंगी, उन्हें भारी करों के रूप में भारी कीमत चुकानी होगी। यह नीति अमेरिका को स्वास्थ्य क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की एक आक्रामक योजना है।

जेनरिक और ब्रांडेड दवाओं का पेचीदा गणित

बाजार विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे केवल ‘धारणा आधारित गिरावट’ मान रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि भारत से अमेरिका को होने वाले कुल निर्यात में 90% से अधिक हिस्सा जेनरिक दवाओं का है। फिलहाल ट्रंप का फोकस ब्रांडेड और पेटेंट वाली दवाओं पर है। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका के लिए जेनरिक दवाओं पर प्रतिबंध लगाना या उन पर भारी कर लगाना मुश्किल होगा, क्योंकि इससे वहां स्वास्थ्य सेवाएं बहुत महंगी हो जाएंगी। हालांकि, सन फार्मा जैसी कंपनियां जो स्पेशलिटी दवाओं के कारोबार में हैं, उन्हें अधिक जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।

API निर्यात और भारतीय कंपनियों की भावी रणनीति

सिर्फ दवाओं ही नहीं, बल्कि एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) बनाने वाली कंपनियों जैसे डिविस लैब्स और लॉरस लैब्स पर भी दबाव देखा गया है। भारत हर साल करीब 10.5 अरब डॉलर की दवाओं का निर्यात अमेरिका को करता है। संकट की इस घड़ी में कई भारतीय कंपनियां पहले से ही सतर्क हैं। उदाहरण के तौर पर, बायोकॉन ने न्यू जर्सी में अपनी इकाई शुरू कर दी है। जानकारों का कहना है कि भारतीय कंपनियों को अब अपनी रणनीति बदलते हुए अमेरिका में स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने पर जोर देना होगा ताकि टैरिफ के प्रभाव को शून्य किया जा सके।

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