रंगभरी एकादशी का धार्मिक रहस्य — इस दिन आंवला पूजन से मिलता है कई गुना पुण्य

रंगभरी एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। फाल्गुन मास की शुक्ल एकादशी को आमलकी एकादशी या रंगभरी एकादशी भी कहा जाता है। इस साल पुण्य नक्षत्र में व्रत रखा जाएगा। इस बार 27 फरवरी को रंगभरी एकादशी है। मान्यता है कि इस एकादशी पर जो व्रत करते हैं, उन्हें साल में पड़ने वाले 24 एकादशी के बराबर लाभ मिलता है। आमलकी एकादशी का महत्व अक्षय नवमी के समान है। इस एकादशी व्रत पर अमला के पेड़ की पूजा के साथ ही अन्नपूर्णा के दर्शन से विशेष लाभ मिलता है। आमलकी एकादशी या रंगभरी एकादशी पर

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Published On :

फ़रवरी 26, 2026

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रंगभरी एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। फाल्गुन मास की शुक्ल एकादशी को आमलकी एकादशी या रंगभरी एकादशी भी कहा जाता है। इस साल पुण्य नक्षत्र में व्रत रखा जाएगा। इस बार 27 फरवरी को रंगभरी एकादशी है। मान्यता है कि इस एकादशी पर जो व्रत करते हैं, उन्हें साल में पड़ने वाले 24 एकादशी के बराबर लाभ मिलता है। आमलकी एकादशी का महत्व अक्षय नवमी के समान है। इस एकादशी व्रत पर अमला के पेड़ की पूजा के साथ ही अन्नपूर्णा के दर्शन से विशेष लाभ मिलता है।
आमलकी एकादशी या रंगभरी एकादशी पर बनेंगे कई शुभ योग

इस साल की रंगभरी एकादशी पर चार शुभ योगों का संयोग बन रहा है। आमलकी एकादशी के दिन रवि योग, आयुष्मान योग, सौभाग्य योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है। इन योग में किए गए पूजन, दान और जप-तप का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। इस शुभ संयोग में विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा और आंवला वृक्ष की आराधना अत्यंत शुभ मानी जाती है।

कब है रंगभरी या आमलकी एकादशी?
हिन्दू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी का आरंभ 26 फरवरी की रात 08:03 बजे से होगा और 27 फरवरी की शाम 06:02 बजे पर समापन होगा।

रंगभरी एकादशी का महत्व: पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु ने कहा है कि जो प्राणी स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं, उनके लिए आमलकी एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव, माता पार्वती से विवाह के बाद पहली बार अपनी प्रिय काशी नगरी आए थे। वहां आकर शिव ने देवी पार्वती के साथ होली खेली थी।

जानें क्यों होती है इस दिन आंवले की पूजा
आमलकी एकादशी का महत्व अक्षय नवमी के समान है। पुरोहित अरुण त्रिपाठी के अनुसार, इस दिन आंवला वृक्ष की पूजा का खास विधान है, क्योंकि इसी दिन सृष्टि के आरंभ में सबसे पहले आंवला वृक्ष की उत्पति हुई थी। आंवला वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इसके स्मरण मात्र से गौ दान का फल मिलता है, स्पर्श करने से दोगुना और फल भक्षण करने से तिगुना फल प्राप्त होता है। इसके मूल में विष्णु, उसके ऊपर ब्रह्मा, तने में रुद्र, शाखाओं में मुनिगण, टहनियों में देवता, पत्तों में वसु, फूलों में मरुदगण और फलों में समस्त प्रजापति वास करते हैं।

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