भोपाल का लाजवाब स्वाद: नवाबी दस्तरखान से ‘रसाल’ तक, हर कौर में छिपी विरासत

इंदौर पिछली कड़ी में हमने इंदौर के सर्राफा और होलकर विरासत के चटपटे सफर का आनंद लिया था। इस वीकेंड, हम अपनी यात्रा को मध्य प्रदेश के उस हिस्से की ओर मोड़ते हैं जहां हवाओं में नवाबी तहजीब और शाही दस्तरखानों की महक घुली है। यहां पेश है आपके वीकेंड के लिए एक और विशेष स्टोरी। मध्य प्रदेश के खान-पान की जब भी बात होती है, तो भोपाल और उसके आस-पास के शाही घरानों का जिक्र अनिवार्य हो जाता है। यहाँ का जायका सिर्फ पेट नहीं भरता, बल्कि एक बीते हुए दौर की गवाही देता है।   जहानुमा घराना: अफगानी

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Published On :

मार्च 8, 2026

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इंदौर
पिछली कड़ी में हमने इंदौर के सर्राफा और होलकर विरासत के चटपटे सफर का आनंद लिया था। इस वीकेंड, हम अपनी यात्रा को मध्य प्रदेश के उस हिस्से की ओर मोड़ते हैं जहां हवाओं में नवाबी तहजीब और शाही दस्तरखानों की महक घुली है। यहां पेश है आपके वीकेंड के लिए एक और विशेष स्टोरी। मध्य प्रदेश के खान-पान की जब भी बात होती है, तो भोपाल और उसके आस-पास के शाही घरानों का जिक्र अनिवार्य हो जाता है। यहाँ का जायका सिर्फ पेट नहीं भरता, बल्कि एक बीते हुए दौर की गवाही देता है।
 
जहानुमा घराना: अफगानी जड़ें और भोपाली पसंदे
भोपाल का 'जहानुमा घराना' अपनी नवाबी मेहमान-नवाजी के लिए मशहूर है। इनकी रसोइयों का सबसे बड़ा तोहफा है- 'भोपाली पसंदे'। वैसे तो पसंदे एक मुगलिया डिश है, लेकिन भोपाल में इसे बनाने का अंदाज बिल्कुल जुदा है। उत्तर भारत के विपरीत, यहां के पसंदे बिना करी (ग्रेवी) के बनाए जाते हैं। अंडर-कट मीट को तली हुई प्याज, भुने चने, खोपरा और बादाम के पेस्ट में रात भर मैरिनेट किया जाता है और फिर धीमी आंच पर पकाया जाता है।

दाल-गोश्त: जब मजबूरी बनी लजीज परंपरा
भोपाल की एक और मशहूर डिश है 'दाल-गोश्त'। इसके पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प है। कहा जाता है कि दिल्ली सल्तनत और मुगलों के दौर में जब गोश्त महंगा होता था और परिवार बड़ा, तब पेट भरने के लिए गोश्त में दाल मिलाई जाती थी। समय के साथ यह 'जुगाड़' एक शाही डिश बन गया। मांश या मसूर की दाल के साथ कोयले की आंच पर पका यह गोश्त आज भी भोपाल की रसोइयों की जान है।

जमींदार घराना: शाकाहारी विरासत और 'रसाल' का जादू
इंदौर के करीब 'जमींदार घराना' अपने आप में अनोखा है। जहां देश के अधिकतर राजघरानों में मांसाहार का बोलबाला रहा, इस घराने ने 1704 से अपनी शुद्ध शाकाहारी परंपरा को निभाया है। इनकी रसोइयों की सबसे दुर्लभ डिश है 'रसाल'। ठंड के मौसम में जब गन्ने का ताजा रस निकलता है, तब इसे बड़े कढ़ा में उबाला जाता है। इसमें गलाए हुए चावल डालकर 3-4 घंटे तक इतनी धीमी आंच पर पकाया जाता है कि रस और चावल एक-दूसरे में पूरी तरह समा जाएं। बादाम और पिस्ते से सजी यह डिश मालवा की मिठास का प्रतीक है।

रीवा की विरासत: बघेली चिकन और इंदिराहार
विंध्य क्षेत्र की ओर बढ़ें तो रीवा रियासत का 'बघेली चिकन' अपनी अलग पहचान रखता है। शिकार के शौकीन बघेल राजाओं ने इसे देसी घी और भुने हुए खड़े मसालों के साथ विकसित किया। वहीं, शाकाहारी व्यंजनों में 'इंदिराहार' (पांच दालों का मिश्रण) गुजरात और राजस्थान की याद दिलाता है, जिसे फर्मेंट करके बड़ी कुशलता से तैयार किया जाता है।
 
स्वाद जो कहता है इतिहास
चाहे वो भोपाल का यखनी पुलाव हो या जमींदार घराने का रसाल, मध्य प्रदेश का हर निवाला एक कहानी कहता है। यह खाना सिर्फ मसालों का मेल नहीं, बल्कि उन राजाओं, नवाबों और किसानों की विरासत है जिन्होंने इस राज्य को 'स्वाद का केंद्र' बनाया।

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