Tarique Rahman PM: बांग्लादेश में तारिक रहमान युग का उदय, निर्वासन, जेल और मौत की सजा के बाद अब संभालेंगे प्रधानमंत्री की कुर्सी

तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में लोकतंत्र की वापसी हो गई है। 17 साल तक लंदन में निर्वासन काटने और दर्जनों कानूनी लड़ाइयों के बाद तारिक रहमान अब देश के नए वजीरे-आला बनने जा रहे हैं। जेल में मिली यातनाओं से लेकर प्रधानमंत्री पद तक के इस सफर की पूरी इनसाइड स्टोरी पढ़ें।

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 13, 2026

Tarique Rahman PM: बांग्लादेश के राजनीतिक क्षितिज पर 12 फरवरी 2026 का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। 13वें संसदीय चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की ‘लैंडस्लाइड विक्ट्री’ ने यह साफ कर दिया है कि देश की जनता अब बदलाव चाहती है। इस जीत के साथ ही तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना तय हो गया है। 17 साल का लंबा निर्वासन, जेल की यातनाएं और अदालती मुकदमों के भंवर से निकलकर तारिक रहमान का सत्ता के शिखर तक पहुँचना किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। वह 36 वर्षों के अंतराल के बाद बांग्लादेश के पहले पुरुष प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं, जो देश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है।

विरासत और शुरुआती राजनीति: जिया परिवार का उत्तराधिकारी

20 नवंबर 1965 को ढाका में जन्मे तारिक रहमान की रगों में राजनीति दौड़ती है। उनके पिता जिया-उर-रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति और बीएनपी के संस्थापक थे, जबकि उनकी मां खालिदा जिया ने तीन बार प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया। तारिक ने 1990 के दशक में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और 1991 के चुनावों में अपनी मां की जीत सुनिश्चित करने के लिए पर्दे के पीछे से महत्वपूर्ण रणनीतियां बनाईं। हालांकि, उनकी असली राजनीतिक ताकत 2001 में सामने आई, जब बीएनपी फिर से सत्ता में लौटी और तारिक पार्टी के सबसे प्रभावशाली चेहरे बनकर उभरे।

‘हवा भवन’ का दौर और ‘डार्क प्रिंस’ की छवि

खालिदा जिया के दूसरे पूर्ण कार्यकाल के दौरान तारिक रहमान का प्रभाव इतना बढ़ गया कि ढाका का ‘हवा भवन’ सत्ता का समानांतर केंद्र बन गया। यहीं से पार्टी के सभी बड़े नीतिगत फैसले लिए जाते थे। हालांकि, इसी दौरान उन पर भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगे। विपक्षी पार्टी अवामी लीग ने उन्हें ‘डार्क प्रिंस’ का नाम दिया, जिससे उनकी छवि को काफी नुकसान पहुँचा। यह उनके जीवन का वह दौर था जहाँ से उनके संघर्षों की नींव पड़ी।

17 साल का निर्वासन: जेल की कालकोठरी से लंदन की गलियों तक

साल 2007 में बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता के बीच सैन्य समर्थित अंतरिम सरकार ने तारिक को गिरफ्तार कर लिया। उन पर 84 मुकदमे दर्ज किए गए, जिनमें मनी लॉन्ड्रिंग और 2004 का ग्रेनेड हमला प्रमुख थे। जेल में उन्हें इतनी यातनाएं दी गईं कि उनकी रीढ़ की हड्डी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई। 2008 में जमानत मिलने के बाद वे इलाज के बहाने लंदन चले गए। 11 सितंबर 2008 को शुरू हुआ यह सफर 17 साल के स्वनिर्वासन में बदल गया। उन्होंने लंदन से ही वीडियो कॉल के जरिए अपनी पार्टी को जीवित रखा और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया।

मौत की सजा और ऐतिहासिक ‘घर वापसी’

शेख हसीना के 15 साल के शासनकाल में तारिक रहमान को एक मामले में मौत की सजा तक सुनाई गई। ऐसा लगने लगा था कि वे कभी वापस नहीं लौट पाएंगे। लेकिन अगस्त 2024 के छात्र आंदोलन ने पासा पलट दिया और हसीना सरकार का पतन हो गया। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान अदालतों ने उनके खिलाफ सभी मुकदमों को रद्द कर दिया। 25 दिसंबर 2025 को जब वे ढाका एयरपोर्ट पहुंचे, तो लाखों समर्थकों ने उनका ऐसा स्वागत किया जैसे कोई विजेता युद्ध जीतकर लौटा हो।

भविष्य का संकल्प: भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस और लोकतंत्र

स्वदेश लौटने के मात्र 50 दिन बाद तारिक ने चुनाव लड़ा और ढाका-17 व बोगरा-6 सीटों से शानदार जीत हासिल की। अब 60 वर्षीय तारिक रहमान एक ‘नरम स्वभाव’ वाले परिपक्व नेता के रूप में उभरे हैं। उन्होंने देश की जनता से ‘स्वच्छ राजनीति, भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस और युवाओं को रोजगार’ देने का वादा किया है। उनकी यह जीत केवल एक पार्टी की जीत नहीं, बल्कि उनके निजी संघर्षों और धैर्य की भी जीत है।

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