Taiwan-China Row: एशियाई राजनीति और वैश्विक कूटनीति के पटल पर ताइवान और चीन के बीच चल रहा तनाव अब अफ्रीका महाद्वीप तक पहुँच गया है। ताइवान के राष्ट्रपति लाइ चिंग-ते को अपना प्रस्तावित अफ्रीका दौरा कथित तौर पर बीजिंग के कड़े हस्तक्षेप और कूटनीतिक दबाव के कारण टालना पड़ा है। यह घटनाक्रम न केवल ताइवान की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही पर लगे प्रतिबंधों को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि चीन किस तरह से वैश्विक हवाई क्षेत्रों और छोटे देशों की विदेश नीति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।
तीन अफ्रीकी देशों ने अचानक रद्द की उड़ान अनुमति
राष्ट्रपति लाइ चिंग-ते 22 से 26 अप्रैल 2026 के बीच एस्वातिनी (Eswatini) की यात्रा पर निकलने वाले थे, जो अफ्रीका में ताइवान का एकमात्र आधिकारिक राजनयिक सहयोगी है। हालांकि, यात्रा शुरू होने से ठीक पहले ताइपे को एक बड़ा झटका लगा। हिंद महासागर के तीन महत्वपूर्ण देशों—सेशेल्स, मॉरीशस और मेडागास्कर—ने राष्ट्रपति के विमान को अपने हवाई क्षेत्र (Airspace) से गुजरने की अनुमति अचानक वापस ले ली। ताइपे में राष्ट्रपति कार्यालय के महासचिव पान मेंग-आन ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि बिना किसी पूर्व सूचना के परमिट रद्द करना अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल का उल्लंघन है।
ताइवान का आरोप: चीन के आर्थिक दबाव का नतीजा
ताइवान ने इस कूटनीतिक गतिरोध के लिए सीधे तौर पर चीन को जिम्मेदार ठहराया है। पान मेंग-आन के मुताबिक, सेशेल्स, मॉरीशस और मेडागास्कर जैसे देशों ने चीन के भारी आर्थिक प्रलोभन और दबाव में आकर यह कदम उठाया है। ताइवान का मानना है कि चीन इन विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे और निवेश के नाम पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है और बदले में उन्हें ताइवान को अलग-थलग करने के लिए मजबूर करता है। ताइपे ने इसे अन्य देशों के संप्रभु निर्णयों में चीन का सीधा हस्तक्षेप करार दिया है, जिससे ताइवान के लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं।
चीन की ‘एक चीन’ नीति और ताइवान की संप्रभुता का संघर्ष
इस विवाद की जड़ चीन की ‘वन चाइना पॉलिसी’ (One China Policy) में छिपी है। बीजिंग ताइवान को अपना एक अटूट हिस्सा और एक ‘विद्रोही प्रांत’ मानता है। चीन का आधिकारिक स्टैंड है कि ताइवान के पास किसी भी देश के साथ आधिकारिक या राजकीय संबंध रखने का कोई अधिकार नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में, चीन ने उन देशों पर कूटनीतिक दबाव बढ़ा दिया है जो ताइवान को मान्यता देते हैं। चीन अक्सर यह धमकी देता है कि वह जरूरत पड़ने पर ताइवान को बलपूर्वक अपने नियंत्रण में ले सकता है, जिससे प्रशांत क्षेत्र और उससे परे सैन्य तनाव बना रहता है।
घटते राजनयिक साथी: ताइवान के पास अब केवल 12 मित्र देश
चीन की ‘चेकबुक डिप्लोमेसी’ और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भारी निवेश के कारण ताइवान के राजनयिक सहयोगियों की संख्या लगातार कम हो रही है। वर्तमान में दुनिया भर में केवल 12 ऐसे देश बचे हैं जिनके ताइवान के साथ औपचारिक संबंध हैं। हाल ही में, जनवरी 2024 में नाउरू ने ताइवान से रिश्ता तोड़कर चीन का हाथ थाम लिया था। इससे पहले 2023 में होंडुरास और 2021 में निकारागुआ ने भी ताइवान का साथ छोड़ दिया था। एस्वातिनी वर्तमान में अफ्रीका में ताइवान का एकमात्र स्तंभ बना हुआ है, जिसे बचाने के लिए ताइपे हर संभव कोशिश कर रहा है।
वैश्विक कूटनीति में बढ़ता गतिरोध
राष्ट्रपति लाइ चिंग-ते के दौरे का रद्द होना यह संकेत देता है कि चीन अब केवल ताइवान के आसपास के समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वह दूरदराज के हवाई क्षेत्रों को भी नियंत्रित करने की क्षमता रखता है। मॉरीशस और मेडागास्कर जैसे देशों की चुप्पी यह बताती है कि वे चीनी निवेश को खोने का जोखिम नहीं उठा सकते। यह घटनाक्रम आने वाले समय में ताइवान के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की चुनौतियों को और अधिक कठिन बना देगा। अब ताइपे को अपने बचे हुए सहयोगियों के साथ संबंधों को बनाए रखने के लिए नए कूटनीतिक रास्तों की तलाश करनी होगी।
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