UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य को बड़ी कानूनी राहत दी है। उपाध्याय समुदाय और चारों शंकराचार्यों को लेकर की गई कथित विवादास्पद टिप्पणी के मामले में उनके खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका अदालत ने खारिज कर दी। हालांकि, हाईकोर्ट ने याची को कानून के तहत उपलब्ध दूसरे रास्ते अपनाने की स्वतंत्रता दी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किस मामले में सुनाया फैसला?
बताते चले कि, जस्टिस चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने अधिवक्ता रमेश उपाध्याय की ओर से दाखिल क्रिमिनल रिट याचिका पर सुनवाई की। याचिका में स्वामी रामभद्राचार्य के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर FIR दर्ज कराने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका में अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया और मामले को नियमानुसार आगे बढ़ाने की बात कही।
उपाध्याय समुदाय पर टिप्पणी का क्या है पूरा मामला?
आपकी जानकारी के लिए बता दे कि, याचिकाकर्ता अधिवक्ता रमेश उपाध्याय ने खुद को उपाध्याय समुदाय से जुड़ा बताया। उनका आरोप था कि स्वामी रामभद्राचार्य की एक कथित टिप्पणी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। याची के मुताबिक, इस वीडियो में उपाध्याय समुदाय को कथित तौर पर नीच या हीन बताया गया और चारों शंकराचार्यों को फर्जी कहे जाने की बात सामने आई।
वायरल वीडियो को लेकर याची ने क्या आरोप लगाए?
याचिका में कहा गया कि कथित टिप्पणी से न सिर्फ याचिकाकर्ता बल्कि पूरे उपाध्याय समुदाय की भावनाएं आहत हुईं। याची का दावा था कि टिप्पणी के कारण उन्हें मानसिक पीड़ा और सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ा। इसी आधार पर उन्होंने पुलिस से शिकायत कर स्वामी रामभद्राचार्य के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की थी।
FIR दर्ज नहीं होने पर पुलिस पर लगाए गए आरोप
रमेश उपाध्याय के अनुसार, उन्होंने 8 अक्टूबर 2025 को वाराणसी पुलिस के सामने शिकायत देकर FIR दर्ज करने की मांग की थी। उनका आरोप था कि शिकायत के बावजूद पुलिस ने मामले में कोई कार्रवाई नहीं की। याचिकाकर्ता ने इसके पीछे स्वामी रामभद्राचार्य के प्रभाव को कारण बताया और हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की।
हाईकोर्ट ने सीधे याचिका दाखिल करने पर उठाया सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया। सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि याची ने संबंधित थाने में उचित तरीके से संपर्क नहीं किया और FIR दर्ज न होने की स्थिति में BNSS की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन भी नहीं दिया। इसके बजाय याची सीधे हाईकोर्ट पहुंच गए।
अनुच्छेद 226 के तहत सीधे हाईकोर्ट आने पर टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज न होने की स्थिति में उपलब्ध वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। अदालत के मुताबिक, पहले संबंधित कानूनी उपाय अपनाना जरूरी है और उसके बाद ही उचित परिस्थितियों में हाईकोर्ट का रुख किया जा सकता है। अदालत ने इस प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल करने को मेरिट के अभाव वाला कदम माना।
स्वामी रामभद्राचार्य मामले में आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट ने FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने याची के लिए आगे का कानूनी रास्ता बंद नहीं किया है। कोर्ट ने उन्हें नियमानुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दाखिल करने की छूट दी है। इसके बाद यदि कानून के मुताबिक आवश्यकता बनती है तो याची आगे उचित कानूनी कदम उठा सकते हैं।
हाईकोर्ट के फैसले का क्या मतलब है?
इस आदेश से फिलहाल स्वामी रामभद्राचार्य के खिलाफ FIR दर्ज करने का हाईकोर्ट से सीधा निर्देश नहीं मिला है। अदालत ने मुख्य रूप से याचिका दाखिल करने की प्रक्रिया पर जोर दिया है। यानी मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि याची के लिए अब मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने का रास्ता खुला है। आगे की कार्रवाई उसी प्रक्रिया और संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत तय होगी।










