Supreme Court: भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने देश के नागरिकों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और अभूतपूर्व फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट तौर पर ‘पैदल चलने के अधिकार’ (Right to Walk) को भारतीय संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) घोषित कर दिया है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने अपने फैसले में यह साफ कर दिया कि देश के फुटपाथों पर पैदल चलने वाले नागरिकों का अधिकार, सड़कों पर दौड़ने वाले मोटर वाहनों की आवाजाही की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण और प्राथमिक है।
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अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मिला संरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिकार को देश के हर नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर देखा है। अदालत के अनुसार, पैदल चलने का यह अधिकार संविधान के दो महत्वपूर्ण अनुच्छेदों के तहत पूरी तरह सुरक्षित और संरक्षित है, यह नागरिकों को पूरे देश में कहीं भी स्वतंत्र रूप से घूमने की आजादी देता है। अदालत ने कहा कि आवाजाही का सबसे प्राथमिक माध्यम पैदल चलना ही है।सम्मान और सुरक्षा के साथ जीने का अधिकार। सुरक्षित फुटपाथों का न होना नागरिकों के जीवन को खतरे में डालता है।
पीठ ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि कहीं भी कोई सड़क मौजूद है, तो यह संबंधित प्रशासन और सरकार का एक प्रवर्तनीय (लागू करने योग्य) कर्तव्य है कि वह पैदल चलने वालों के लिए एक स्पष्ट फुटपाथ सीमांकित करे और उसका उचित रखरखाव सुनिश्चित करे।
5 साल के मासूम की मौत से जुड़ा है यह पूरा मामला
यह ऐतिहासिक फैसला एक बेहद दर्दनाक मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामले की सुनवाई के दौरान आया। एक पांच साल के मासूम बच्चे को उसके पिता सुबह 9 बजे स्कूल लेकर जा रहे थे। उसी दौरान पीछे से आ रही एक तेज रफ्तार टैंकर लॉरी ने बच्चे को जोरदार टक्कर मार दी। इस हादसे में बच्चे की कमर और शरीर का निचला हिस्सा बुरी तरह कुचल गया, जिससे उसकी मौत हो गई।
अदालत ने संज्ञान लिया कि जिस जगह यह दर्दनाक हादसा हुआ, वहां पैदल चलने वालों के लिए न तो कोई फुटपाथ बना था और न ही कोई पेडेस्ट्रियन क्रॉसिंग (जेब्रा क्रॉसिंग) की व्यवस्था थी। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे के पिता के दर्द को समझते हुए मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 11,44,628 रुपये कर दिया और इसे दो महीने के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया। साथ ही, हाई कोर्ट के उस पुराने आदेश को भी रद्द कर दिया जिसने मुआवजे की राशि को कम कर दिया था।
लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर ठोक सकेंगे हर्जाना
अदालत ने नागरिकों को एक और बड़ा कानूनी हथियार दिया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी क्षेत्र में सीमांकित फुटपाथ नहीं है या उस पर अवैध कब्जा है और नागरिकों के इस मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वे जिम्मेदार अधिकारियों और नगर निकायों के खिलाफ संवैधानिक व कानूनी रास्ता अपना सकते हैं।
नागरिक इसके लिए मुआवजे और बहाली (रेस्टिट्यूशन) का दावा ठोक सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह कानूनी रास्ता मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act) के तहत मिलने वाले दावों से पूरी तरह स्वतंत्र और अलग होगा।
वाहनों से ऊपर है पैदल यात्री
शहरी विकास और सड़कों की मौजूदा प्लानिंग पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज हमारे शहरों और कस्बों का निर्माण पैदल चलने वालों को भूलकर केवल वाहनों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है, जिससे पैदल यात्रियों की सुरक्षा हमेशा खतरे में रहती है।
अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “पहिए के आविष्कार से बहुत पहले से मनुष्य पैदल चलता आ रहा है।” इसलिए, वाहनों के उपयोग से पहले पैदल चलने का अधिकार आता है और सरकारों को अपनी प्लानिंग में सुरक्षित फुटपाथों तक जनता की पहुंच को अनिवार्य रूप से शामिल करना होगा।
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