Supreme Court: यौन अपराधों के मामलों में अदालतों की संवेदनशीलता को लेकर एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी करते हुए कहा है कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता (Judicial Sensitivity) पर राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी समिति की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ देश के सभी उच्च न्यायालयों (High Courts) की आधिकारिक वेबसाइटों पर तुरंत अपलोड किया जाए।
यह पूरा मामला तब गरमाया जब सुप्रीम कोर्ट के सामने पटना हाई कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट के कुछ विवादित फैसलों का जिक्र आया, जिनमें महिलाओं के खिलाफ हुए गंभीर यौन उत्पीड़न को केवल ‘मर्यादा भंग’ या छेड़छाड़ मानकर बलात्कार के प्रयास (Attempt to Rape) की धाराओं को हटा दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए जजों और जांच एजेंसियों को संवेदनशील बनने की हिदायत दी है।
Sonam Wangchuk Hunger Strike: सोनम वांगचुक की हालत पर चिंता गहराई, अनशन को लेकर हाई कोर्ट में याचिका
पटना और इलाहाबाद हाई कोर्ट के किन फैसलों पर हुआ विवाद?
उच्च न्यायालयों के कुछ हालिया फैसलों ने कानूनी और सामाजिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी थी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने अदालत को बताया कि हाल ही में 9 जुलाई को पटना हाई कोर्ट ने एक ऐसा आदेश पारित किया, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला की सलवार उतारना और उसकी छाती दबाना बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का पिछला आदेश: इससे पहले, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी 17 मार्च, 2025 को एक ऐसा ही फैसला सुनाया था। उस आदेश में कहा गया था कि किसी लड़की के पजामे का नाड़ा खींचना और उसके स्तनों को पकड़ना रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता। इलाहाबाद हाई कोर्ट के इसी आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए न्यायिक संवेदनशीलता पर एक विस्तृत रिपोर्ट और हैंडबुक तैयार करवाई थी।
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘जजों को भी रिसर्च करनी चाहिए’
पटना हाई कोर्ट के इस फैसले की जानकारी मिलने पर जस्टिस वी. मोहना और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की पीठ ने गहरी चिंता जताई। जस्टिस मोहना ने सवाल किया कि क्या पटना हाई कोर्ट ने इस तरह का फैसला देते समय सुप्रीम कोर्ट के उस पुराने आदेश का अध्ययन नहीं किया था, जिसमें जजों को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर विशेष रूप से सजग रहने का निर्देश दिया गया था?
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल स्टाफ के भरोसे काम नहीं चल सकता, जजों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे फैसले लिखने से पहले खुद कुछ कानूनी रिसर्च करें। उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि स्टाफ कुछ नहीं कर रहा है।”
सर्वोच्च अदालत ने साफ निर्देश दिया कि देश की सभी अदालतें और न्यायाधीश यौन अपराधों से जुड़ी कानूनी हैंडबुक में दिए गए दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करें। इसके साथ ही, राज्य सरकारों को आदेश दिया गया है कि वे सभी पुलिस स्टेशनों को एफआईआर (FIR) दर्ज करते समय और चार्जशीट दाखिल करते समय इस हैंडबुक के नियमों का पालन करने के लिए पाबंद करें।
क्या था 2008 का अमरपुर स्टूडियो मामला?
जिस मामले में पटना हाई कोर्ट ने यह विवादित टिप्पणी की, वह साल 2008 की एक घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक युवती अपने पिता के साथ बिहार के अमरपुर में स्थित एक फोटोग्राफी स्टूडियो में फोटो खिंचवाने गई थी। फोटो खींचने के बाद स्टूडियो के मालिक ने चालाकी से युवती के पिता को यह कहकर बाहर भेज दिया कि उसे कंप्यूटर पर फोटो चेक करनी है। इसके बाद उसने अंदर से स्टूडियो का दरवाजा बंद कर लिया और युवती के साथ जबरदस्ती करने लगा।
जब पीड़िता ने शोर मचाया, तो उसके पिता दरवाजा खुलवाने के लिए दौड़े। पकड़े जाने के डर से आरोपी मौके से भाग निकला। पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज किया और निचली अदालत (Trial Court) ने सबूतों व गवाहों के आधार पर आरोपी को आईपीसी की धारा 376/511 (बलात्कार का प्रयास) और गलत तरीके से बंधक बनाने का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की थी।
पटना हाई कोर्ट की दलील
जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने जब इस मामले के सबूतों पर दोबारा विचार किया, तो उन्होंने पाया कि रिकॉर्ड में कोई पुख्ता मेडिकल सबूत मौजूद नहीं था। साथ ही, ट्रायल के दौरान जांच अधिकारी (IO) से भी पूछताछ नहीं की गई थी और पूरा केस केवल पीड़िता और उसके माता-पिता के बयानों पर आधारित था।
हाई कोर्ट ने माना कि भले ही अभियोजन पक्ष की कहानी को पूरी तरह सच मान लिया जाए, फिर भी आरोपी की हरकतें—जैसे दरवाजा बंद करना, सलवार उतारने का प्रयास करना और छाती दबाना—आईपीसी की धारा 354 के तहत ‘महिला की मर्यादा भंग करने’ (छेड़छाड़) के अपराध को तो साबित करती हैं, लेकिन इसे बलात्कार की कोशिश नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने आरोपी की बलात्कार के प्रयास वाली सजा को रद्द कर दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत गंभीरता से लेते हुए देश की पूरी न्यायिक प्रणाली को सतर्क रहने को कहा है।
CJI News: CJI पर अभद्र टिप्पणी के बाद कार्रवाई, कोर्ट में बवाल करने वाले 2 छात्र गिरफ्तार










