Assam CM: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा कथित तौर पर “मिया” समुदाय के खिलाफ की गई विवादित टिप्पणियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सीधा हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की सलाह दी है।
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शीर्ष अदालत का रुख
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उन याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें मुख्यमंत्री के सोशल मीडिया पोस्ट और भाषणों को ‘हेट स्पीच’ बताते हुए SIT जांच और FIR की मांग की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के बजाय अधिकार क्षेत्र वाले हाई कोर्ट का रुख करें। बेंच ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं को हाई कोर्ट की शक्तियों को कम नहीं आंकना चाहिए। यदि वहां से मिलने वाली राहत पर्याप्त नहीं लगती, तब सुप्रीम कोर्ट के विकल्प खुले रहेंगे।
त्वरित सुनवाई का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि वे इस मामले पर तुरंत ध्यान दें और जल्द सुनवाई सुनिश्चित करें। पीठ ने कहा कि चूंकि अधिकारियों और सीएम के खिलाफ विशिष्ट निर्देश मांगे गए हैं, इसलिए प्रभावी फैसला स्थानीय अधिकार क्षेत्र वाले हाई कोर्ट द्वारा ही सुनाया जाना चाहिए। अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई भी राय जाहिर किए बिना इसे स्थानांतरित कर दिया।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद की दलील
भारतीय मुसलमानों के प्रमुख संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इस मामले में याचिका दायर की थी। संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी के अनुसार, मुख्यमंत्री द्वारा इस्तेमाल किया गया ‘मिया’ शब्द एक पूरे समुदाय को नीचा दिखाने के लिए अपमानजनक तरीके से उपयोग किया गया है। याचिका में तर्क दिया गया कि जब कोई व्यक्ति उच्च संवैधानिक पद पर बैठा हो, तो उसके ऐसे बयानों को केवल ‘राजनीतिक बयानबाजी’ या ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विवादास्पद भाषण का विवरण
याचिका में विशेष रूप से 27 जनवरी, 2026 को दिए गए एक भाषण का उल्लेख है। आरोप है कि मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से चार से पांच लाख “मिया” मतदाताओं को सूची से हटाने और अपनी पार्टी के “सीधे मिया समुदाय के खिलाफ” होने का ऐलान किया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह न केवल नफरत फैलाता है, बल्कि एक पूरे समुदाय को बदनाम करने की सोची-समझी कोशिश है, जो भाईचारे और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।
संवैधानिक अधिकारियों के लिए गाइडलाइन की मांग
जमीयत ने एडवोकेट फारुख रशीद और सीनियर एडवोकेट एमआर शमशाद के माध्यम से मांग की है कि संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के लिए सख्त रेगुलेटरी गाइडलाइन बनाई जाएं। याचिका में जोर दिया गया है कि ‘कानून का राज’ सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि कोई भी व्यक्ति अपनी शक्ति की आड़ में सांप्रदायिक नफरत या दुश्मनी न भड़काए। कोर्ट से आग्रह किया गया है कि ऐसी निगरानी प्रणाली विकसित की जाए जिससे समुदायों को टारगेट करने वाले भाषणों पर रोक लग सके।
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