Supreme Court judges : केंद्र की मोदी सरकार ने देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने और न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की अधिकतम स्वीकृत संख्या में बढ़ोतरी करने का महत्वपूर्ण फैसला किया है। इस रणनीतिक फैसले को अमलीजामा पहनाने के लिए कल देर रात देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की आधिकारिक मंजूरी के बाद एक विशेष अध्यादेश (Ordinance) जारी कर दिया गया है। चूंकि यह अध्यादेश तुरंत प्रभाव से पूरे देश में लागू हो गया है, इसलिए आगामी दिनों में जजों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। सरकार संसद के आगामी मॉनसून सत्र में इस संबंध में एक औपचारिक बिल (विधेयक) पेश करेगी, जिसे पारित कराकर इस अध्यादेश को एक स्थाई कानून का रूप दे दिया जाएगा।
अब मुख्य न्यायाधीश समेत सुप्रीम कोर्ट में होंगे कुल 38 जज
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 (1) के तहत राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए इस नए अध्यादेश में सुप्रीम कोर्ट के जजों के मौजूदा ढांचे में बड़ा बदलाव किया गया है। इसके तहत शीर्ष अदालत में जजों की कुल स्वीकृत संख्या को वर्तमान के 33 से बढ़ाकर 37 करने का स्पष्ट प्रावधान किया गया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस निर्धारित संख्या में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल नहीं होते हैं। यदि मुख्य न्यायाधीश को भी इस संख्या में जोड़ दिया जाए, तो व्यवहारिक और पूर्ण रूप से सुप्रीम कोर्ट में जजों की कुल ताकत बढ़कर 38 हो जाएगी। इस व्यवस्था को लागू करने के लिए सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से दशकों पुराने ‘सुप्रीम कोर्ट (नंबर ऑफ जजेज) एक्ट 1956’ में आवश्यक संशोधन किया है।
नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड का चौंकाने वाला आंकड़ा
सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का यह फैसला समय की मांग बन चुका था, जिसकी तस्दीक खुद न्यायपालिका के आंकड़े करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के आधिकारिक डैशबोर्ड से मिले ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में सर्वोच्च अदालत में लंबित मामलों (पेंडिंग केसेज) की कुल संख्या 93,617 तक पहुंच चुकी है। राहत की बात सिर्फ इतनी है कि इनमें से करीब 39.67 फीसदी मामले ऐसे हैं, जिन्हें लंबित हुए अभी एक साल से भी कम का समय हुआ है। अगर इन लंबित मुकदमों का वर्गीकरण किया जाए, तो कुल मामलों में से 72,883 मामले दीवानी (सिविल) प्रकृति के हैं, जबकि शेष 20,734 मामले फौजदारी (क्रिमिनल) अपराधों से जुड़े हुए हैं।
वर्तमान में दो पद चल रहे हैं खाली
एक तरफ जहां जजों की संख्या बढ़ाने का ऐतिहासिक फैसला हुआ है, वहीं दूसरी तरफ वर्तमान स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट में स्वीकृत 33 जजों के पदों में से भी दो पद काफी समय से खाली पड़े हैं। देश में मुकदमों के त्वरित और समयबद्ध निपटारे के लिए कानूनविदों द्वारा समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने की मांग पुरजोर तरीके से उठाई जाती रही है। इससे पहले आखिरी बार साल 2019 में जजों की संख्या में वृद्धि की गई थी, जब मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर यह संख्या 30 से बढ़ाकर 33 की गई थी। यदि इतिहास पर नजर डालें तो साल 1950 में जब भारतीय सुप्रीम कोर्ट का गठन हुआ था, तब मुख्य न्यायाधीश सहित कुल जजों की संख्या मात्र 8 थी। इसके बाद पहली बार साल 1956 में संसद ने कानून बनाकर जजों की संख्या को बढ़ाकर 11 किया था।

क्या होती है अध्यादेश की संवैधानिक प्रक्रिया और कितने दिनों तक रहती है इसकी कानूनी मियाद?
भारतीय संविधान के स्थापित नियमों के मुताबिक, जब देश में संसद का कोई भी सत्र (लोकसभा या राज्यसभा) नहीं चल रहा हो और किसी बेहद महत्वपूर्ण विषय पर तुरंत कानून बनाना आवश्यक हो, तो केंद्रीय कैबिनेट की सिफारिश पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से अध्यादेश जारी किया जा सकता है। इस अध्यादेश की कानूनी शक्ति बिल्कुल संसद से पास हुए कानून जैसी ही होती है। हालांकि, संविधान में इसके लिए एक अनिवार्य शर्त भी तय की गई है कि किसी भी अध्यादेश की कुल मियाद (वैधता) केवल 6 महीने की होती है। इस 6 महीने की अवधि के भीतर सरकार को उस अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों से पारित कराकर राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी लेनी होती है, जिसके बाद ही वह एक स्थाई कानून बन पाता है। यदि निर्धारित समय में संसद की मंजूरी नहीं मिलती है, तो अध्यादेश स्वतः ही निरस्त हो जाता है।










