SIR West Bengal: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) प्रक्रिया को लेकर चल रहा विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज तक पहुँच गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतदाता सूची में सुधार की इस प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। गौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ सांसदों, डोला सेन और डेरेक ओब्रायन की याचिकाएं पहले से ही इस मामले में अदालत में लंबित हैं, जिन पर 4 फरवरी को सुनवाई होने की उम्मीद है। अब ममता बनर्जी की नई याचिका को भी इन्हीं के साथ जोड़कर सुने जाने की संभावना प्रबल हो गई है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को ममता बनर्जी का कड़ा पत्र
सुप्रीम कोर्ट जाने से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शनिवार शाम मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को एक और पत्र लिखकर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। अपने पत्र में उन्होंने राज्य में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान अपनाई जा रही कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए। मुख्यमंत्री ने अपने पिछले पत्राचार का हवाला देते हुए दोहराया कि इस प्रक्रिया के कारण बंगाल की जनता को भारी मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ रही है। उन्होंने एक चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा कि इस अव्यवस्थित प्रक्रिया के परिणामस्वरूप राज्य में अब तक लगभग 140 लोगों की जान जा चुकी है।
मानवाधिकारों के उल्लंघन और नियमों की अनदेखी का आरोप
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर हमला बोलते हुए कहा कि एसआईआर प्रक्रिया को लागू करने में मानवाधिकारों और बुनियादी मानवीय संवेदनाओं की पूरी तरह से अवहेलना की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और उससे संबंधित स्थापित नियमों का घोर उल्लंघन कर रहा है। मुख्यमंत्री के अनुसार, यह प्रक्रिया एक “विशेष, संवेदनशील और अर्ध-न्यायिक” कार्य है, लेकिन इसे जिस तरह से जमीन पर उतारा जा रहा है, वह पूरी तरह से असंवैधानिक और नियमों के परे है।
8,100 सूक्ष्म पर्यवेक्षकों की तैनाती पर सवाल
मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग द्वारा अपनाए गए नए दृष्टिकोण पर प्रहार करते हुए कहा कि भारतीय चुनावी इतिहास में यह पहली बार है जब किसी राज्य में एसआईआर प्रक्रिया के लिए लगभग 8,100 सूक्ष्म पर्यवेक्षकों (Micro-observers) को तैनात किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन पर्यवेक्षकों की नियुक्ति एकतरफा तरीके से की गई है। ममता बनर्जी के अनुसार, इन नियुक्त व्यक्तियों के पास न तो पर्याप्त प्रशिक्षण है और न ही इस संवेदनशील कार्य को करने की कोई सिद्ध विशेषज्ञता। उन्होंने इसे बंगाल की चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है।
अदालती सुनवाई और राजनीतिक भविष्य
तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि इस प्रक्रिया के जरिए विपक्ष के प्रभाव वाले क्षेत्रों के मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है। अब सबकी नजरें 4 फरवरी को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि अदालत ममता बनर्जी की दलीलों से सहमत होती है, तो यह चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है। फिलहाल, बंगाल में मतदाता सूची संशोधन का यह मुद्दा एक बड़े संवैधानिक और कानूनी संघर्ष का रूप ले चुका है, जिसका असर आने वाले चुनावों की निष्पक्षता पर भी पड़ सकता है।
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